एटा,
खुले आम सड़कों पर पत्रकारों की हत्या आखिर कबतक,पत्रकार भी तो जाता है,बिना हथियार के कवरेज करने,फिर चाहे इस आपराधिक समाज से सच्चाई निकालने,या फिर एक सस्ता मास्क पहनकर कोरोना की करवरेज—
एटा–मय की बू छोड़कर सभी प्रेस परिवार को आगे आकर पहले अपने परिवार के बेटे और बेटियों को बचाना होगा,नाकि कुर्सी इस कुर्सी तले खुले आम हमारे पत्रकार भाई और बहने शहीद हो रहे है,अपराधियों के हाथों लेकिन सरकार ने इनकी समाधि बनाने के लिये भी एक बोरी मशाला तक अपनी तरफ से नही दिया बिना परिवार के मांगे,तब हम सभी पत्रकार परिवारों से कहना चाहेगे कि अगर उशूल जिंदा बचे हो तो अपने परिवार के सदस्य के लिये आगे आएं और इस बेखबर सरकार से अपने और अपने परिवारों के भविष्य के लिये,सुरक्षा से लेकर अपने हाथ मजबूत करें हम भी खबर लेने बिना हथियार के जाते है,जहां पुलिस जाती,हमभी एक सस्ता मास्क पहनकर जाते है,उसी कोरोना की कवरेज करने जहां परआपके अधिकारी जाते है,लेकिन हजारों भाषणों की तारीफें हुई चैनलों के माध्यम से पर कलमकार लावारिस ही रहा उसके इस त्याग पर दो शब्द भी सरकार के पास नहीं होते है, सामने आया इस शासन का तो सिर्फ खुले आम सड़कों पर शहीद होना,बिडम्बना फिरभी नशीव कुछ पत्रकारों के ही चमक रहे है,क्यों कि वह सरकार के— लेकिन हम भूल जाते है,कलम से बड़ा कुछभी नहीं है,आज आप है कल कोई और होगा समय पर जागना जरूरी होता है,तब पत्रकारों की हत्या या अन्य घटनाओं पर उसके परिवार को एक करोड़, की मदद दी जाए, सुरक्षा के लिये हथियार, और पेंशन,शहीद पत्रकारों को और परिवार की सुरक्षा की जाए।
