सत्ताधारी पार्टी परेशानियों का सामना कर रही है, तो विपक्षी दलों में भी परेशानियां कम नही

राज्य में सत्ताधारी पार्टी परेशानियों का सामना कर रही है, तो विपक्षी दलों में भी परेशानियां कम नही, रिपोर्ट योगेश मुदगल

भाजपा, कांग्रेस और जद (एस) के नेताओं को बड़े सिरदर्द का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि टिकटों के बंटवारे को लेकर पार्टियों में आंतरिक कलह छिड़ गई है। कलह की यह बीमारी कुछ प्रमुख राजनीतिक परिवारों में भी फैल गई है, जो अपने भीतर से ही विद्रोह का सामना कर रहे हैं। कर्नाटक में मुद्दाविहीन चुनावों की पूर्व संध्या पर जारी कलह ने मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है। कर्नाटक की राजनीति, जो कभी राजनेताओं के बीच सद्भाव के लिए जानी जाती थी, जहां राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी साथ बैठ कॉफी साझा किया करते थे, अब आपस में ही भिड़ने लगे हैं।

हालांकि, चुनावी मुकाबला बहुत करीबी है। कुल मिलाकर, यह एक ऐसा राज्य है, जहां कांग्रेस पार्टी अपनी मुख्य प्रतिद्वंद्वी भाजपा पर कुछ बढ़त हासिल करती लग रही है। कांग्रेस प्रतिद्वंद्वी सिद्धारमैया और डी के शिव कुमार के बीच मतभेदों को दूर करते हुए एक एकजुट चेहरा पेश करने में कामयाब रही है। सत्ता विरोधी लहर और भाजपा के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई द्वारा संचालित सरकार निश्चित रूप से उनके उद्देश्य में मदद कर रही है।

हालांकि, कांग्रेस पार्टी का सिरदर्द अलग किस्म का है। जैसे ही इसने अपने उम्मीदवारों की दूसरी सूची की घोषणा की, कुछ कांग्रेस नेताओं ने घोषणा की कि वे पार्टी छोड़ रहे हैं। पूर्व एमएलसी रघु अचार, जिन्हें चित्रदुर्ग विधानसभा सीट से वंचित कर दिया गया था, ने घोषणा की कि वह जद (एस) में शामिल हो रहे हैं। इसी सीट के एक अन्य उम्मीदवार एस के बसवराजन ने भी पार्टी छोड़ने का फैसला किया है। मांडॺा के एक कांग्रेस नेता के राधाकृष्ण भी नाखुश हैं। उन्होंने कहा कि पार्टी छोड़ने पर अंतिम फैसला लेने से पहले वह अपने कार्यकर्ताओं से बात करेंगे।

कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद के लिए भी जोरदार कोशिशें चल रही हैं। सिद्धारमैया की भी अपनी चिंताएं हैं। काफी टालमटोल के बाद उन्होंने वरुणा निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने का फैसला किया है। भाजपा अब उनके खिलाफ एक मजबूत उम्मीदवार खड़ा करने की योजना बना रही है, ताकि सिद्धारमैया अपने क्षेत्र में ही रहने को मजबूर हो जाएं।

दूसरी ओर, भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री और दरकिनार किए जा रहे ताकतवर लिंगायत नेता बी एस येदियुरप्पा भी परेशान हैं। 2018 में वह चाहते थे कि उनका बेटा वरुणा से चुनाव लड़े, पर भाजपा आलाकमान ने उन्हें टिकट देने से इनकार कर दिया, जिससे उन्हें गंभीर नाराजगी हुई। अब 2023 में पार्टी आलाकमान चाहता है कि उनका बेटा विजेंद्र वरुणा से चुनाव लड़े, पर येदियुरप्पा तैयार नहीं हैं। वह नहीं चाहते कि उनके बेटे को बलि का बकरा बनाया जाए। वह चाहेंगे कि वह अपने गृह क्षेत्र शिकारीपुरा से चुनाव लड़ें।

साफ है, विधानसभा टिकट बंटवारे को लेकर भाजपा के भीतर घमासान शुरू हो गया है। पार्टी को तीन दर्जन विधानसभा क्षेत्रों में बगावत का सामना करना पड़ रहा है। जिन सीटों पर भाजपा की जीत तय है, वहां कम से कम पांच उम्मीदवार हैं। राज्य इकाई ने प्रत्येक सीट से तीन-तीन उम्मीदवारों की सूची बनाई थी और अंतिम निर्णय पार्टी आलाकमान पर छोड़ दिया था। हालांकि, इससे भी भाजपा में बगावत की स्थिति बन गई है।

यहां भाजपा नेतृत्व एक तंग राह पर चल रहा है, पार्टी के कुछ नेता मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई से नाराज हो गए हैं, क्योंकि उन्हें एक प्रमुख अभिनेता किच्छा सुदीप का समर्थन प्राप्त है। पहले पार्टी के उत्साही नेताओं ने सोचा कि सुदीप भाजपा में आ रहे हैं, लेकिन सुदीप ने यह घोषणा करके उनके सपनों पर ठंडा पानी डाला कि वह भाजपा में शामिल नहीं हो रहे हैं और उनका समर्थन सिर्फ मुख्यमंत्री के लिए है, जिन्होंने व्यक्तिगत संकट के समय मदद की थी।

खैर, जब कांग्रेस और भाजपा के नेता सियासी हमले में जुटे हैं, तब जद (एस) के संरक्षक और पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा एक अलग संकट का सामना कर रहे हैं। 90 वर्षीय पिता देवेगौड़ा अब अपने बेटों रेवन्ना और कुमारस्वामी के बीच मध्यस्थता को मजबूर हो रहे हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि बड़े भाई की पत्नी भवानी रेवन्ना हसन सीट से चुनाव लड़ने की इच्छुक हैं, जो एक पारिवारिक गढ़ है। कुमारस्वामी ने स्पष्ट कर दिया है कि यह सीट योग्य पार्टी कार्यकर्ता के पास जाएगी। भवानी के बेटे प्रज्वल रेवन्ना और सूरज रेवन्ना इस निर्वाचन क्षेत्र से क्रमश सांसद और एमएलसी हैं।

आपसी झगड़ों के अलावा राज्य में अमूल दुग्ध सहकारी समिति के प्रवेश की घोषणा और हाल ही में एक वैध मवेशी ट्रांसपोर्टर की हत्या के आरोपी गौरक्षक की गिरफ्तारी को लेकर भाजपा को राजनीतिक सिरदर्दी का सामना करना पड़ रहा है। राज्य भाजपा इकाई ने विकास के गुजरात मॉडल का गर्व से बखान करते हुए अमूल सहकारी की सफलता का हवाला दिया था और कहा था कि इसके प्रवेश से राज्य में दूध और दुग्ध उत्पादों की बिक्री को बढ़ावा मिलेगा। आगामी प्रचार में जो भुला दिया गया, वह यह था कि अमूल ब्रांड वर्गीज कुरियन द्वारा बनाया गया था, जो एक सामाजिक उद्यमी हैं, जिन्हें भारत की श्वेत क्रांति का जनक भी कहा जाता है और उनका कार्यकाल भाजपा के विकास के बहुप्रचारित गुजरात मॉडल से पहले का था।

गृह मंत्री अमित शाह ने अमूल और कर्नाटक सरकार की सहकारी संस्था नंदिनी के बीच सहयोग की बात की थी। किसान नेताओं व विपक्ष ने दावा किया है कि इसके परिणामस्वरूप 55,000 करोड़ रुपये के घरेलू उद्योग और स्थानीय दुग्ध उत्पादक किसानों के व्यवसाय का अंत हो जाएगा। कर्नाटक में अमूल के लिए तेज अभियान चल रहा है। नतीजतन, अमूल का विरोध भी तेज हो गया है। हैश टैग ‘अमूल वापस जाओ’ और ‘नंदिनी बचाओ’ वायरल होने लगे हैं। यह विवाद ऐसे समय में पैदा हुआ है, जब कर्नाटक में लम्पी रोग के चलते दूध उत्पादन 99 लाख लीटर के दैनिक संग्रह से गिरकर केवल 71 लाख लीटर प्रतिदिन रह गया है।

महाराष्ट्र ने कर्नाटक के सीमावर्ती जिलों में भी अपनी स्वास्थ्य बीमा योजना को लागू करके भाजपा को मुश्किल में डाला है। विपक्ष ने राज्य की बोम्मई सरकार पर तीखा हमला करते हुए उसे कमजोर बताया और आरोप जड़ दिया कि वह महाराष्ट्र सरकार के दबाव का सामना करने में असमर्थ है। इन विवादों ने भाजपा के अभियान को प्रभावित किया है। कुल मिलाकर, राज्य में सत्ताधारी पार्टी परेशानियों का सामना कर रही है, तो विपक्षी दलों में भी परेशानियां कम नहीं हैं।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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