
दिल्ली व अन्य शहरों में भी कूड़े के पहाड़ सुलगते रहते हैं, पर हम इसे गंभीरता से नहीं लेते
आग बुझने के बाद भी कूड़े में भीतर- भीतर आग का सुलगते रहना व रह-रहकर भड़क जाना असामान्य नहीं है। भारी मात्रा में पानी से आग बुझाने के दौरान कचरों में ऑक्सीजन पहुंचता है और इससे आग ज्यादा देर तक सुलगती रह सकती है या भड़क सकती है। कूड़े के ढेर या पहाड़ में मिथेन जैसी ज्वलनशील गैसें मुख्यत जैविक सड़े कूड़े के विघटन से तेजी से ऑक्सीडेसन से पैदा होती हैं। भीतर-भीतर सालों तक अगर आग सुलगती रहे, तो वह अचानक बड़े अग्निकांड को जन्म दे सकती है। दिल्ली व अन्य शहरों में भी कूड़े के पहाड़ सुलगते रहते हैं, पर हम इसे गंभीरता से नहीं लेते।
गरमियों में कूड़े के ढेर या पहाड़ में स्वत आग लगती रहती है, इसे ऑटोइग्नेशन कहते हैं। इसीलिए केंद्र के 2016 के ठोस कचरा प्रबंधन संबंधी दिशा-निर्देशों में यह शामिल किया गया कि लैंडफिल्स में वही कूड़ा जा सकता है, जो रिसाइकिल न किया जा सके, जो घुलनशील व ज्वलनशील न हो। अनुमानत भारत के लैंडफिल्स में 60 प्रतिशत कूड़ा बायोडिग्रेबिल या घुलने योग्य होता है, 25 प्रतिशत नॉन-बायोडिग्रेबल व 15 प्रतिशत मिट्टी-बजरी या इनैक्टिव कचरा होता है। हालांकि, यह सच है कि देश में अन्य जगहों की तरह ही कोच्चि डंपयार्ड में 70-80 प्रतिशत कचरा वही पहुंचता है,जो अलग-अलग नहीं किया होता है। कोच्चि डंपयार्ड में प्लास्टिक की मात्रा बहुत ज्यादा थी । कागज, प्लास्टिक, लकड़ी जलाएं, तो अनेक जहरीली गैसें पैदा होती हैं। यही कहानी पूरे भारत की है।
हालांकि, प्रयास और दावे जारी हैं। इसी 23 मार्च को दिल्ली के उप-राज्यपाल ने बताया है कि पिछले सात माह में तीनों लैंडफिल्स में प्रत्येक की ऊंचाई 15 मीटर कम हुई है। कूड़े का इस्तेमाल, सड़क, भवन निर्माण, सीमेंट कारखानों, पेपर मिल्स इत्यादि में हो रहा है। बात स्पष्ट है, दिल्ली में केंद्र के ठोस कचरा प्रबंधन दिशा-निर्देशों की अवहेलना हो रही थी। कोई संदेह नहीं, यदि ईमानदारी से दिशा-निर्देश का अनुपालन हो, तो कूड़े में आग लगने की आशंका कम रहेगी। कोच्चि ब्रह्मपुरम वेस्ट ट्रीटमेंट प्लांट डंपयार्ड में करीब छह लाख टन ठोस कचरा है। यहां पहली बार आग 2013 में लगी थी, 2018 से 2020 के बीच तो सात बार बड़ी आग लगी। चंडीगढ़ के दादूमाजरा लैंडफिल में अप्रैल 2022 तक ही 480 से ज्यादा बार आग लग चुकी थी। 70 एकड़ में फैले दिल्ली के गाजीपुर डंप में 20 अप्रैल, 2022 के पूर्व के तीन साल में 18 बार आग लग चुकी थी।
हर किसी को कुछ-कुछ सुधरना होगा। तरीका बदलना होगा। औपचारिक ठेकेदार तो करोड़ों रुपये लेकर बायो माइनिंग करते हैं, किंतु कूड़ा चुनने वाले भी बिना किसी से पैसे लिए यही काम करते हैं। सरकारी व गैर-सरकारी स्तरों पर प्रशिक्षण के साथ-साथ कूड़ा बीनने वालों को उपयुक्त स्वास्थ्य प्रतिरक्षण उपकरण व सुरक्षा व वाजिब मेहनताना भी मिले, तो हम कूड़ा जल्दी हटा पाएंगे। हर किसी को जागना पड़ेगा।
दावा है कि भारत में इंदौर सेवन स्टार कचरा मुक्त शहर है। विश्व स्तर पर उपलब्ध सूचनाओं के अनुसार, स्विट्जरलैंड में कोई कचरा लैंडफिल्स में नहीं जाता है। दक्षिण कोरिया के बारे में भी ऐसा ही कुछ कहा जाता है। स्वीडन में सिर्फ एक प्रतिशत कचरा लैंडफिल्स में जाता है, वहां 52 प्रतिशत कचरे को ऊर्जा में बदला जाता है व 47 प्रतिशत को रिसाइकिल कर दिया जाता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)