अष्टम दिन पूज्य महाराज जी ने भरत चरित्र की कथा का किया वर्णन

अष्टम दिन पूज्य महाराज जी ने भरत चरित्र की कथा का किया वर्णन

जय जय रामकथा के अष्टम दिन पूज्य महाराज जी ने भरत चरित्र की कथा सुनाते हुए कहा कि ,”जग जप राम राम जप जेहि,” अर्थात भगवान स्वयम भरत जी का स्मरण करते है मानस में भरत जी को अनेक लोगो ने महिमा मंडित किया है
तीर्थराज प्रयाग ने कहा की भरत सब विधि साधु हैं
भगवान ने स्वयं कहा कि लखन भरत जैसा पवित्र भाई संसार मे नही मिल सकता
जनक जी ने सुनयना जी से कहा कि रानी भरत की महिमा राम जानते तो है परंतु वे भी बता नही सकते
भरत जी की साधना को बताते हुए पूज्यश्री ने कहा कि उनकी कठिन साधना को देखकर बड़े बड़े साधु संत भी उनके पास जाने में घबराते थे स्वयं वसिष्ठ जी भी जाने से कतराते थे
पिता की मृत्यु अवाम भगवान के वन गमन का समाचार मिलने पर भरत जी विह्वल हो गए और विलाप करने लगे माता कैकेई को बहुत बुरा भला कहा है सारी सभा को फटकार लगाई है कौशल्या जी के समझाने पर भरत जी शांत हुए है और सबको आश्वासन फ़िया है कि हमसबको भगवान से मिलाने ले चलेंगे और पूरी प्रजा भरत जी के साथ भगवान से मिलने चित्रकूट चली है भगवान से मिलन हुआ है भगवान के आदेश से उनकी पादुका सिरोधार्य कर भरत जी अयोध्या वापस आये है और उसी पादुका को सिंहासन पर रखकर अयोध्या के राजकाज को संभाला है इस कारुणिक प्रसंग को सुनकर सम्पूर्ण जनमानस श्रोतासमाज भावविह्वल हो गया ,सबकी अश्रुधार फुट पड़ी एवं सम्पूर्ण वातावरण भक्तिमय हो गया
इस अवसर पर आयोजक आशुतोष प्रताप सिंह,डा.संजय सिंह राठौर, विरेन्द्र दूबे किशन चौबे,विष्णु रघुवंशी सहित हजारो कि संख्या मे मानस प्रेमी उपस्थित रहे।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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