राम नवमी पर विशेष

असल में राम का जो नाम है और उसमें जो सहज निहित विनम्रता है, वह बड़े काम की रही है। दुर्भाग्यवश आज समाज में विनम्रता की कमी आई है।
राम नवमी पर विशेष
हमारे पारंपरिक देश भारत में ऐसा नहीं है। आज भी बहुत लोग मिलते हैं, तो परस्पर राम-राम करते ही हैं। बहुत सारे गांवों में यह संस्कृति जीवित है। ट्रेन, बस यात्राओं के दौरान बहुत से लोग आज भी आपको अनजान लोगों को राम-राम कहते मिल जाएंगे। आम अभिवादन के लिए इस नाम का सहज चयन मर्यादा पुरुषोत्तम राम के चरित्र के अनुरूप है। यह नाम कथित आधुनिकता व स्वार्थ की जड़ता को अपने उच्चारण मात्र से तोड़ देता है। हमारे पारंपरिक नगरों में कोई साधु या याचक अचानक कहीं से प्रकट होता है और जय राम जी कहकर हमें जगा देता है। तुलसीदास जी लिखते हैं-

राम प्रनाम कीन्ह सब काहू। मुदित भए लहि लोयन लाहू।।

देहिं असीस परम सुखु पाई। फिरे सराहत सुंदरताई।।

यहां स्वयं रामजी प्रयाग निवासियों का अभिवादन कर रहे हैं। असर यह हो रहा है कि रामजी को ऐसे देखकर सभी आनंदित हो रहे हैं, परमसुख पाकर आशीर्वाद दे रहे हैं और राम की सराहना करते लौट रहे हैं। रामजी के प्रणाम करने मात्र से जो समाज निर्मित हो रहा है, वह कितना सुंदर है!

इस शब्द की ध्वनि ऐसी है कि वह जल्द ही हृदय में उतर जाती है और वह आपको बहुत भली लगती है। राम से हमारा सदा ही सखा का भाव रहा है। राम के जो रूप हमारे नए ग्रंथों में आते हैं, वे भी अद्भुत हैं। मैथिलीशरण गुप्त के यहां साकेत में राम का जो रूप है, वह बहुत प्रभावी है। यहां राम मानो अपना मन खोलकर रख देते हैं –

भव में नव वैभव व्याप्त कराने आया,

नर को ईश्वरता प्राप्त कराने आया।

संदेश यहां मैं नहीं स्वर्ग का लाया।

इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आया।

असल में, राम का जो नाम है और उसमें जो सहज निहित विनम्रता है, वह बड़े काम की रही है। दुर्भाग्यवश आज समाज में विनम्रता-भाव में कमी आई है। वस्तुत हम राम का नाम इतनी विनम्रता से यूं ही नहीं लेते, राम अतुलनीय रूप से विनम्र हैं। उनमें कहीं अहंकार नहीं है, कहीं ईर्ष्यादोष नहीं है। तुलसीदास ने तो रामजी के इन गुणों का बार-बार सुंदरता से वर्णन किया है। मैथिलीशरण गुप्त ने यह अकारण नहीं लिखा है- राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है/ कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है।

राम के नाम के आशय बहुत गहरे हैं। जब हम यह नाम हम लेते हैं, तो हममें एक विनम्रता आती है, हमारा व्यवहार-विचार निर्मल होता है। यदि हम राम को मर्यादा पुरुषोत्तम मानते हैं, जो वह हैं, तो उसका क्या अर्थ है? उसका अर्थ यही है कि इस नाम में जो मर्यादा छिपी हुई है, उसका हम बार-बार स्मरण करते हैं। यह जो स्मरण करना है राम के प्रसंग से बहुत सारी चीजों का, बताता है कि इस देश ने उनसे क्या सीखा है, मन और कंठ में कैसे बसाया है!

एक स्पेनी लेखक थे, उनसे किसी ने पूछा कि आप पर किन-किन लेखकों-कवियों और चीजों का प्रभाव है? यह आमतौर पर लेखकों से पूछा जाता है। इस प्रश्न का उस लेखक ने बड़ा सुंदर उत्तर दिया कि जब से स्पेनिश भाषा बनी है, तब से इसमें किसी ने जो कुछ कहा है, लिखा है, उन सबका प्रभाव मेरे ऊपर है। यह बात हम सभी सोचने-लिखने-पढ़ने वाले भारतीयों पर भी लागू होती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस देश में रामचर्चा अथाह हुई है। राम का नाम हमारी हिंदी में ही नहीं, बल्कि तमाम भारतीय भाषाओं में बहुत तरह से बोला, गाया, लिखा गया है।

राम को हर दौर में देखा और सोचा गया है। हम लोगों के दौर में साकेत का बहुत प्रभाव था। गांधी, लोहिया ने भी राम पर विचार किया। राम यदि मात्र पौराणिक चरित्र थे, तब भी वह हमारे जीवन में उतर गए हैं। शिव थे या नहीं, यह प्रासंगिक नहीं है, पर वह आज हैं, क्योंकि हमने उन्हें गढ़ा है और अब वह हमारे साथ रहते हैं, हर जगह, हर पल। लोक ने राम, कृष्ण को गढ़ा है, ऐसा राम मनोहर लोहिया भी मानते थे। यदि लोक ने भी गढ़ा है, तो एक ही रूप में नहीं गढ़ा है। ऐसा नहीं है कि राम केवल राजा हैं। वह पुत्र हैं, भाई हैं, पति हैं, पिता हैं और सबसे बढ़कर सखा हैं।

राम कभी अकेले नहीं रहते। राम के साथ जो युग्म बने हैं, वे अतुल्य हैं- राम-लक्ष्मण, राम-लखन, सीता-राम, राम-कृष्ण इत्यादि। राम के बिना सीता या सीता के बिना राम की पूर्णता नहीं होती। अत हमें राम का एकआयामी रूप बनाने से बचना चाहिए। राम को तमाम रूपों-स्वरूपों में उपलब्ध रहने दीजिए। यह आग्रह हमें करना चाहिए, क्योंकि यह आग्रह कम हुआ है। जयश्रीराम कहना गलत नहीं है, लेकिन सीताराम या सियाराम कहने के अर्थ-भाव अलग हैं। यह सच्चाई है कि अब राम को आक्रामक व्यक्ति के रूप में भी चित्रित किया जा रहा है। उनके परमसेवक हनुमान की भी क्रोधित छवियां नजर आने लगी हैं। क्या हमें आज विनम्रता की ज्यादा जरूरत नहीं है?

लोक-स्वरूप या लोक-छवियों वाले राम को बचाए रखना होगा। हमें यह भी सुनना होगा कि राम को हमारी संस्कृति ने कैसे गाया है। लोक-गायिकी तो बिना राम के चल ही नहीं सकती। पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक राम व्याप्त हैं। लक्ष्मणाचार्य द्वारा संयोजित नाम रामायण के पदों को एम एस सुब्बुलक्ष्मी ने अद्भुत गाया है, शुद्ध ब्रह्म परात्पर राम/ कालात्मक परमेश्वर राम/ शेष तल्प सुख निद्रित राम…।

कितना सुंदर लिखा है कि ब्रह्म का सार राम हैं। विध्वंसक का सार राम हैं। शेषनाग पर शयन करने वाले, जिनकी ब्रह्मा और अन्य देव भी आराधना करते हैं। राम, जिनका जन्म सूर्यवंश में हुआ था। राम, जो दशरथ के आनंद के स्रोत हैं। राम, जिन्होंने कौशल्या के जीवन को बहुत सुखी बना दिया। राम, जो विश्वामित्र के सबसे प्रिय कोश हैं। ऐसे राम को ही लोग पूजते हैं।

राम के यहां बहाव है। वह महल भी जाते हैं, वन भी; आश्रमों में जाते हैं, तो युद्धभूमि में भी उतरते हैं। वह हमें कर्म और कर्तव्य के अनुरूप जीवन का संदेश देते हैं। राम कभी नहीं लड़ाते, सतत सबको जोड़ते हैं, इसलिए वह ज्यादा याद किए जाते हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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