भारतीय लोकतंत्र की विडंबना यह है कि इसके विधायी सदनों में दागियों की संख्या उत्तरोतर बढ़ती ही जा रही

आतंक और खौफ का कारोबार करने वाले तत्वों के खिलाफ सख्त सजा
भारतीय लोकतंत्र की विडंबना यह है कि इसके विधायी सदनों में दागियों की संख्या उत्तरोतर बढ़ती ही जा रही

करीब डेढ़ दशक पहले हुई बसपा विधायक राजू पाल की हत्या के चश्मदीद गवाह उमेश पाल के अपहरण के मामले में प्रयागराज की एमपी-एमएलए अदालत ने बाहुबली अतीक अहमद और उसके दो सहयोगियों दिनेश पासी व सौलत हनीफ को दोषी पाते हुए सश्रम उम्रकैद की जो सजा सुनाई है, उसका स्वागत ही किया जाएगा। समाज में आतंक और खौफ का कारोबार करने वाले तत्वों के खिलाफ सख्त सजा जहां पीड़ितों के साथ इंसाफ करती है, वहीं आम नागरिकों को यह तसल्ली भी बख्शती है कि दोषी कितना भी रसूखदार क्यों न हो, उसे कठघरे में आना ही होगा और अपने किए का अंजाम भी भोगना पड़ेगा। उस हत्याकांड को जिस तरीके से अंजाम दिया गया था, और फिर उमेश पाल के अपहरण के जरिये जिस तरह यह पैगाम देने की कोशिश की गई कि अतीक के खिलाफ कोई मुंह न खोले, वह सीधे-सीधे कानून के राज और तत्कालीन शासन के इकबाल को गंभीर चुनौती देना था, मगर अफसोसनाक यह है कि अपने सियासी रसूख व मजहबी कार्ड की बदौलत वह कानूनी दांव-पेच का फायदा उठाता रहा और जिम्मेदार राजनीतिक पार्टियां उसका इस्तेमाल करती रहीं।

निस्संदेह, यह संतोष की बात है कि इस अपराध से जुड़े एक गुनाह के गुनहगारों को सजा मिल गई है, मगर इस मामले का चिंताजनक पहलू यह है कि इतने जघन्य कांड को पहले फैसले तक पहुंचने में ही लगभग 17 साल लग गए, जबकि ऊपरी अदालतों का इसका सफर अभी बाकी है! आखिर जब गवाह ही खौफजदा होंगे, तो इंसाफ कैसे अपनी मंजिल तय करेगा? सुप्रीम कोर्ट और सरकार को ऐसे मामलों को तयशुदा अवधि में निपटाने की कोई ठोस व्यवस्था करनी चाहिए, जिनसे समाज में नजीर कायम हो सके। हम इस बात को नजरअंदाज नहीं कर सकते कि अतीक जैसे लोग राजनीति का कवच क्यों धारण करते हैं? हमें इस तथ्य को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि देश के सांसदों-विधायकों, पूर्व सांसदों-पूर्व विधायकों के खिलाफ लगभग 3,000 आपराधिक मुकदमे लंबित हैं। इनमें से 950 से अधिक के खिलाफ तो पांच वर्षों से भी अधिक साल से मुकदमे लंबित हैं। कई के खिलाफ ऐसे संगीन आरोप हैं कि यदि वे दोषी करार दिए गए, तो उनकी सदस्यता चली जाएगी। भारतीय लोकतंत्र की विडंबना यह है कि इसके विधायी सदनों में दागियों की संख्या उत्तरोतर बढ़ती ही जा रही है।

बहरहाल, अतीक को मिली सजा का सारगर्भित संदेश यही है कि बाहुबलियों में नायक तलाशती भीड़ को अपनी आंखें खोलनी चाहिए। जिस शख्स पर करीब 60 मुकदमे चल रहे हों, वह किसी का आदर्श कैसे हो सकता है? वह भी हत्या, अपहरण और फिरौती वसूलने जैसे जघन्य अपराधों का आरोपी! उत्तर प्रदेश सरकार ने माफिया तत्वों के खिलाफ जो सख्त रुख अपनाया है, उससे देश भर की तमाम सरकारें अगर सबक लें और बगैर किसी भेदभाव के सभी रसूखदार अपराधियों के खिलाफ जांच एजेंसियां तत्परता दिखाएं, तो इस नासूर से मुक्ति पाने में बहुत वक्त नहीं लगेगा। राजनीतिक दलों के लिए जिताऊ प्रत्याशी के मोह से मुक्त होने का वक्त आ गया है। वे जब तक अपने-अपने भीतर के अतीकों से छुटकारा नहीं पाएंगे, तब तक उनकी सियासत कभी सुर्खरू नहीं होगी। समाज में अपराधियों का मनोबल तोड़ने का पहला जरूरी कदम यही है कि एमपी-एमएलए कोर्ट और आला अदालतें अपने आगे लंबित मामलों का त्वरित निपटारा करें।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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