
@,दीप्ति की कलम से—
आज दो खुशियों का दिन होली और अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस आज भी महिला अपने अधिकारों से दूर है कितने प्रतिशत महिलाएं जानती है अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के बारे और कितनी महिलाओं ने इस पर्व को मनाया और जाना अधिकांश महिलाओं की दिनचर्या चार दिवारी में जन्म लेती है और दम तोड़ देती है महिला अपनी आधी जमीन तक नहीं जानती है कि हैं कहां है अब बात आती है होली की तो रंग और गुलाल हर बार की तरह हर घर में सवाल छोड़ गये कि हम भाईचारे के गले मिले या पैसों के संसाधनों में बिखरती एकता पर जश्न मनाया है हर बार पर्वों की गिरती मान्यता हमें खुद में झांकने के लिए सवाल छोड़ जाते हैं लेकिन हम बदलते बहाव के विपरीत बहते जा रहें है पर समय हमें बक्त पर बदलने की आवाज चीख चीखकर दे रहा है कहीं देर न हो जाए।