भारतीय ज्ञान परम्परा के मार्ग से ही भारत पुनः बनेगा विश्वगुरु: प्रो० पी० एन० झा

भारतीय ज्ञान परम्परा के मार्ग से ही भारत पुनः बनेगा विश्वगुरु: प्रो० पी० एन० झा

एस०एम०एस०, वाराणसी में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस का हुआ समापन
’सतत विकास के लिए भारतीय ज्ञान परम्परा’ पर विद्वानों ने व्यक्त किये विचार
कॉन्फ्रेंस में देश-विदेश से आये लगभग 500 प्रतिभागियों ने प्रस्तुत किये शोध-पत्र

वाराणसी, 5 मार्च: स्कूल ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज, वाराणसी द्वारा आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस का समापन हुआ। समापन सत्र में अतिथियों का स्वागत करते हुए संस्थान के निदेशक प्रो० पी० एन० झा ने कहा कि प्राचीन भारतीय ज्ञान परम्परा अद्वितीय परम्परा का प्रतीक है जिसमें ज्ञान और विज्ञान, लौकिक और पारलौकिक, कर्म और धर्म तथा भोग और त्याग का अद्भुत समन्वय है । कर्म और विद्या के बीच पारस्परिक संबंध को रेखांकित करते हुए प्रो० झा ने कहा कि कर्म वही है जो बंधनों से मुक्त करे और विद्या वही है जो मुक्ति का मार्ग दिखाए । उन्होंने बताया कि शिक्षा के इसी संकल्प को भारतीय ज्ञान परम्परा में अंगीकृत किया गया है । 21वीं सदी में भारत की ’विश्वगुरु’ की भूमिका में आने की कामना करते हुए प्रो० झा ने कहा कि पहले भी जब सारा विश्व अज्ञान रूपी अन्धकार में भटकता था तो भारतीय मनीषी उच्चतम ज्ञान का प्रसार कर मानव को पशुता से मुक्त कर, श्रेष्ठ संस्कारों से युक्त कर सम्पूर्ण मानव बनाते थे । भारत में तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला, वल्लभी, उज्जयिनी, काशी आदि विश्वप्रसिद्ध शिक्षा एवं शोध के प्रमुख केंद्र थे । उन्होंने कहा कि आज जरूरत वापस से विस्मृत हुई सनातन ज्ञान परम्परा को सक्रीय स्मृति का अंग बनाने की है जिससे बाहर पुनः विश्वगुरु की भूमिका में विश्व का मार्गदर्शन करे ।

बतौर मुख्य अतिथि बी० एच० यू० के संस्कृत विभाग के प्रो० सदाशिव कुमार द्विवेदी ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा का सबसे बडा आधार थे वेद और इसलिए अंग्रेजों सहित समस्त यूरोपीय बौद्धिक जगत ने वेदों को निरर्थक साबित करने के लिए एड़ी-चोटी एक कर दिया था। उन्होंने बताया कि स्वाभाविक ही था कि वेदों को परम प्रमाण मानने और उन पर गहरी आस्था रखने वाले वैदिक सनातन समाज पर यह एक गंभीर सभ्यतागत आक्रमण था। इस आक्रमण का वैदिक समाज ने जोरदार सामना किया और इन सभी आरोपों के खंडन और वेदज्ञान की श्रेष्ठता को स्थापित करने के लिए विपुल साहित्य की रचना की। उन्होंने भारत शब्द की रचना में ज्ञान परम्परा की समृद्धि का उद्धरण देते हुए समझाया कि भारत शब्द दो धातुओं भा और रत से मिलकर बना है , ’भा’ का अर्थ है प्रकाश और ’रत’ का अर्थ है संलग्न अर्थात जो सदैव ज्ञान के प्रकाश से आलोकित रहे वह है ’भारत’ ।

दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में दक्षिण अफ्रीका के डरबन तकनीकी विश्वविद्यालय से आये प्रो० रविंदर रेना ने कहा कि यशस्वी जीवन और जीवन की सार्थकता के लिए प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा को जीवन में ग्राह्य करना आवश्यक है, तभी जीवन की सार्थकता है। भारतीय ज्ञान जीवन के हर विषय में समग्रता के साथ है। समग्र व्यक्तित्व विकास के लिए आज प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा को जानने व समझने की जरूरत है। खासकर वर्तमान पीढ़ी और भावी पीढ़ी को बताए जाने की भी आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि गीता के 15 वे अध्याय के 13वे श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि मैं चंद्रमा की रौशनी हूँ, जो वनस्पति में रस के लिए कार्य करता हैं। इस पर अमेरिका में रिसर्च किया गया और पुष्टि होने के बाद किसानों के लिए कैलेंडर तैयार किया गया है।

उदघाटन सत्र का संचालन डॉ० भावना सिंह ने व धन्यवाद ज्ञापन कॉन्फ्रेंस के समन्वयक प्रो० अविनाश चंद्र सुपकर ने दिया । दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस के दूसरे दिन आठ अलग अलग तकनीकी सत्रों का आयोजन भी हुआ जिसमें देश-विदेश से आये लगभग 500 प्रतिभागियों ने शोध-पत्र प्रस्तुत किया । इस अवसर एस०एम० एस०, वाराणसी के अधिशासी सचिव डॉ० एम० पी० सिंह, निदेशक प्रो० पी० एन० झा, कुलसचिव श्री संजय गुप्ता, कॉन्फ्रेंस के समन्वयक प्रो० अविनाश चंद्र सुपकर, प्रो० संदीप सिंह, प्रो० राजकुमार सिंह सहित समस्त अध्यापक और कर्मचारी गण उपस्थित रहे ।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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