
सिर्फ मेला नहीं, भाषाओं और शब्दों का आनंदोत्सव
किताबों का वसंतोत्सव है विश्व पुस्तक मेला, जो आश्वस्त करता है कि मुद्रित शब्दों की शक्ति, सहकार और सौंदर्य अब भी बरकरार है। यह त्योहार है, पाठकों, लेखकों, व्यापारियों, बच्चों का।
कोरोना की त्रासदी के चलते आखिर तीन साल बाद यह अवसर आया है। नई दिल्ली के प्रगति मैदान में बहुत से मेले लगते हैं, लेकिन नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला का अपना आनंद है। यह मेला नहीं, पुस्तकों के साथ जीने, उसे महसूस करने का उत्सव है। सही मायने में यह देश की विविधतापूर्ण भाषायी एकता की प्रदर्शनी है। इस बार का 30वां नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला 25 फरवरी से शुरू होकर 5 मार्च तक है। इस बार का थीम है- आजादी का अमृत महोत्सव और अतिथि देश है- फ्रांस। सन् 1972 में दिल्ली के विंडसर प्लेस से शुरू हुए इस मेले को इस बार 50 साल भी हो रहे हैं।
बीते तीन दशकों से, जब से सूचना प्रौद्योगिकी का प्रादुर्भाव हुआ है, मुद्रण तकनीक से जुड़े लोग इसी भय में जीते रहे हैं कि कहीं कंप्यूटर, टीवी, सीडी की दुनिया छपे हुए अक्षरों को अपनी बहुरंगी चकाचौंध में उदरस्थ न कर ले। जैसे-जैसे चिंताएं बढ़ीं, पुस्तकों का बाजार भी बढ़ता गया। उसे बढ़ना ही था- आखिर साक्षरता दर बढ़ रही है, ज्ञान पर आधारित जीविकोपार्जन करने वालों की संख्या बढ़ रही है। विदित हो, लोकतंत्र आपको सवाल करना और उत्तर के विकल्प देता है, ठीक वैसे ही पुस्तकें इंसान को विकल्प देती हैं वैचारिक और मानसिक दुविधाओं के प्रश्नों का। भारत में पुस्तक व्यवसाय की सालाना प्रगति 20 फीसदी से ज्यादा है। इससे लाखों लोगों को सीधे रोजगार मिला है।
बेशक, यह कहने वाले प्रकाशक भी कम नहीं हैं, जो इसे घाटे का सौदा कहते हैं, लेकिन जब प्रगति मैदान के पुस्तक मेला में छुट्टी के दिन किसी हॉल में घुसो, और वहां की गहमागहमी के बीच आधी बांह का स्वेटर भी उतार फेंकने का मन हो, तो जाहिर हो जाता है कि लोग अब भी पुस्तकों के पीछे कितने दीवाने हैं। असल में, विश्व पुस्तक मेला सिर्फ किताब खरीदने-बेचने की जगह नहीं है, यह पुस्तक प्रेमियों की जरूरत को एक स्थान पर पूरा करने का महज बाजार भी नहीं है। केवल किताब खरीदने के लिए तो दर्जनों वेबसाइट उपलब्ध हैं, जो घर बैठे किताबें पहुंचा देती हैं। दरअसल, पुस्तक भी इंसानी प्यार की तरह होती है, जिससे जब तक बात न करो, रूबरू न हो, स्पर्श न करो, अपनत्व का एहसास देती नहीं है। फिर, तुलनात्मकता के लिए एक ही स्थान पर एक साथ इतने सजीव उत्पाद मिलना एक बेहतर मार्केटिंग विकल्प व मनोवृत्ति भी है। लिहाजा, दिल्ली पुस्तक मेला एक त्योहार है, पाठकों, लेखकों, व्यापारियों, बच्चों का। हर दिन कई सौ पुस्तकों का लोकार्पण, बीस-पच्चीस गोष्ठी-विमर्श, दस-पंद्रह लेखकों से बातचीत के सत्र और बच्चों की गतिविधियां। इतना ही नहीं, विशेष अतिथि देश से आए लेखकों, चित्रकारों, प्रकाशकों से मिलना। ढेर सारे विचार, मतांतर एक ही छत के नीचे, पर सभी का एक ही लक्ष्य- ज्ञान को विस्तार मिले।
दिन चढ़ते ही प्रगति मैदान के लंबे-चौड़े लॉन में लोगों के टिफिन खुल जाते हैं, खाने के स्टॉल खचाखच भरे होते हैं, लोग कंधे छीलती भीड़ में उचक-उचककर लेखकों को पहचानने का प्रयास करते हैं। इसी बीच कुछ मंत्री, कुछ वीआईपी, कुछ फिल्मी सितारे भी आ जाएं, तो भीड़ उनकी ओर निहारने लगती है। कहीं कविता पाठ चलता है, तो कहीं पर व्यंग्य व कहानी पेश करने का आयोजन। अंधेरा होते ही गीत-संगीत की महफिल सज जाती है। इस मेले की खासियत यह भी है कि दूर-दराज से आए और नए लेखक अपनी पांडुलिपियां लेकर प्रकाशकों को तलाशते दिखते हैं, तो कुछ अपनी पुस्तकों को मित्रों को बांटकर सुख पाते हैं।
यहां खेमेबाजी, वैचारिक मतभेद के बीच 50 से ज्यादा भाषाओं की पुस्तकें, हजारों लेखक व प्रकाशक लाखों पाठकों को नौ दिन बांधे रखते हैं। विदेशी मंडप में भले ही अधिकांश पुस्तकें केवल प्रदर्शन के लिए होती हैं, लेकिन गंभीर किस्म के लेखक इनसे आइडिया का सुराख लगाते दिखते हैं। थीम पवेलियन हर समय आम लोगों के आकर्षण का केंद्र रहता है। बच्चों की नैसर्गिक रचनात्मक क्षमता को बढ़ावा देने के लिए बाल मंडप एक महत्वपूर्ण आकर्षण होता है। जाहिर है, पुस्तक मेला में दिल व दिमाग, दोनों पुस्तक के साथ धड़कते-मचलते हैं, तभी तो यह मेला नहीं है, आनंदोत्सव है। पुस्तकों का वसंतोत्सव है, जो आश्वस्त करता है कि मुद्रित शब्दों की शक्ति, सहकार और सौंदर्य अब भी बरकरार है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)