
करुणा के अथाह सागर भोलेनाथ
महादेव की कार्य-संस्कृति में सहिष्णुता और सद्भाव अर्थात अपने कर्म का पालन करते हुए सौहार्द बनाए रखना विशिष्ट रूप से दिखाई देता है। उनसे हमें अवश्य सीखना चाहिए
देवाधिदेव महादेव शिव ज्ञान-विज्ञान-व्यवहार के विलक्षणतम विश्वविद्यालय के सतत कर्मरत कुलाधिपति हैं। जी हां, सतत कर्मरत यानी अवकाश का अध्याय भगवान शिव के कर्मग्रंथ में नहीं है। सृष्टि के पालनकर्ता विष्णुदेव देवउठनी एकादशी तक यानी लगभग चार मास तक अवकाश पर रहते हैं। भले ही इसे अध्ययन अवकाश कह लें या शयन अवकाश। किंतु भगवान शिव के यहां कर्म कैलेंडर में अवकाश की कोई तिथि नहीं है। अधिक स्पष्ट शब्दों में कहें, तो वह अपने श्रद्धालुओं के लिए सदैव तत्पर और उपस्थित रहते हैं। वह भाव देखते हैं और जब भी आवश्यकता होती है, तो अपना ध्यान तोड़ते हैं और कृपा बरसाते हैं। निस्संदेह, ध्यान भी उनके कर्म का ही विस्तार है।
वैसे यहां तात्पर्य भगवान विष्णु और भगवान शिव के दायित्वों की तुलनात्मक समीक्षा करना नहीं है या यह बताना नहीं है कि कौन श्रेष्ठ हैं, ऐसी तुलना या देवताओं के बीच वरिष्ठता का निर्धारण तो केवल देवर्षि नारद ही कर सकते हैं।
फिलहाल, आप इन देवों का स्वभाव तो देखिए, महादेव अक्सर विष्णु-विष्णु जपते हैं और विष्णु का कोई कदम महादेव के आशीर्वाद बिना उठता नहीं है। गोस्वामी तुलसीदास जी के रामायण पाठ में विष्णु अवतार राम जी तो स्वयं बोल उठते हैं कि शिव से द्रोह करने वाले मेरे स्वप्न में भी नहीं आ सकते। मतलब, देवताओं का प्रेम भी तभी हासिल होता है, जब आप सबको समभाव से स्नेह-सम्मान देते हुए चलते हैं।
इस आलेख में देवाधिदेव महादेव पर एक खास द़ृष्टि से विचार रखने का विनम्र प्रयास कर रहा हूं। हालांकि, ऐसा कहा गया है, हम कुछ भी नहीं करते हैं, सब कुछ ईश्वर हमसे करा लेते हैं। ऐसा ही मानते हुए अहंकारहीन होकर हर कार्य संवारने का चलन है। चूंकि भगवान शिव मेरी दृष्टि में निरंतर सक्रिय हैं, तो उनके यहां छुट्टी की भी छुट्टी कर देने की परंपरा है। अनवरत कर्तव्य पालन की कार्य-संस्कृति को अपनाए हुए वह सेवामग्न रहते हैं। नई भाषा में कहें, तो कभी न टूटने वाले ‘नेटवर्क’ पर वह सदा ‘ऑनलाइन’ रहते हैं। वह इस देश में गांव-गांव और गली-गली में मौजूद हैं। उनके जैसा सहज उपलब्ध मन को शक्ति देने वाला शरणदाता और कौन है भला? गौर कीजिए, शिव स्वयं तो कर्मरत रहते हैं, पर अपने गणों को जरूरी अवकाश देते हैं, यानी उन्हें घूमने-विचरने की पूरी स्वतंत्रता देते हैं। वैसे शिवगणों का इधर-उधर घूमना भी एक प्रकार का कार्य ही है। शिवगणों को भी कहां विश्राम है? जिसमें आलस्य नहीं, जिसमें अपने कर्तव्य-कार्य के प्रति पूरा समर्पण है, वही तो शिव को प्रिय हो सकता है। यह भी ध्यान दीजिए, शिव अपने गणों को भी अपना परिवार मानते हैं। उनकी बारात में भांति-भांति के गण ही तो परिजन बनकर नाचे-गाते गए थे!
गणों या अपने सेवकों के प्रति समर्पित शिव वास्तव में बहुत संवेदनशील देव हैं। इसमें क्या दोराय है कि संवेदनशीलता का संस्कार ही दूसरों के दर्द की अनुभूति कराता है। शिव संवेदनशील हैं, इसलिए करुणानिधान हैं। शिव करुणा के सबसे सरल अथाह सागर हैं, इसलिए भोलेनाथ कहलाते हैं। शिव भोले हैं, इसलिए भले हैं। शिव सज्जन हैं, इसलिए सतत कर्मशील हैं।
ध्यान दीजिएगा, शिव का अकेले मन नहीं लगता। उनके साथ उनका पूरा परिवार रहता है, एक ऐसा परिवार, जिसमें सभी अपने-अपने कार्य में लगे हुए हैं। शिव की इस समग्र कार्य-संस्कृति से संयुक्त परिवार की महत्ता भी रेखांकित होती है और परिवार की एकता का संस्कार प्रतिबिंबित होता है।
आज शिव को सामने रखकर हमें जरूर सोचना चाहिए। किसी समय भारत में परिवार परस्पर प्रेम और एकता के जज्बे का ‘जंक्शन’ हुआ करता था, जहां रिश्तों की रेलगाड़ियां रुकती थीं। अब परिवार ऐसा अखाड़ा हो गया है, जहां आनंद-मंगल नहीं, दांव-पेच और दंगल दिखाई देता है। स्पष्ट शब्दों में कहूं, तो यह कि परिवार अब पहले जैसी शालीनता का शामियाना न रहकर कलह का कारखाना हो गया है। अपवादों को छोड़ दें, तो स्थिति यह है कि आज परिवार जुड़ाव की जाजम पर नहीं, फूट की फर्श पर बैठा हुआ है। प्रश्न उठता है कि ऐसा क्यों हो रहा है? इसका सीधा सा उत्तर है कि शिव से प्राप्त हुए दैवीय संस्कार पीछे छूटने लगे हैं, इसलिए परिवार टूटने लगे हैं।
संस्कार की पतवार जब हाथों से छूट जाती है, तो परिवार की एकता की नाव डूब जाती है। अभी भी समय है, यदि हमें परिवार को टूटने से बचाना है, तो शिव परिवार के सदस्यों के अपने-अपने कार्य में लगे रहने के संस्कार से सीख लेनी पड़ेगी। शिव की कार्य-संस्कृति में सहिष्णुता और सद्भाव अर्थात अपने कर्म का पालन करते हुए सौहार्द को बनाए रखना विशिष्ट रूप से दिखाई देता है। सूफी मत भारत में बारहवीं सदी में प्रभावी हुआ, तो इस मत पर शिव की सहिष्णुता, सद्भाव और सौहार्द की संस्कृति का बहुत प्रभाव पड़ा। सूफी संतों के यहां सर्वधर्म सद्भाव की संदली सुगंधा महसूस की जा सकती है।
ध्यान दीजिए, शिव का विस्तार पुत्र भगवान गणेश के रूप में उत्तर भारत में ज्यादा है, तो दक्षिण में पुत्र कार्तिकेय अर्थात मुरुगन संपूर्ण वैभव के साथ प्रतिष्ठित हैं। भारत में देव गणेश उत्तर में अपने विविध रूपों के साथ प्रथम पूज्य हैं, तो देव मुरुगन वीरता, वैभव और सुंदरता के साक्षात संदेश हैं। मां और शक्ति पीठों के रूप में भी शिव का ही पूरे दक्षिण एशिया में विस्तार है। पाकिस्तान में स्थित हिंगलाज माता को मुसलमान ‘नानी पीर’ कहते हैं, तो कोई शिव को पहला पैगंबर भी कह देता है। शिव परिवार का यह अनुपम सुंदर विस्तार अनेक राज्यों-देशों को बांधे हुए है।
शिव व शिव परिवार से जितना सीखा जाए, कम होगा। यहां हर कदम पर सहजता, समता, उपलब्धता, कर्मशीलता और समन्वय की सीख मिलती है। शिव की महिमा किसी एक पंथ-धर्म तक कहां सिमटी है। सूफी संत तो शिव पर फिदा रहे हैं। बस एक मिसाल देखिए, मुगल सेना के कुर्दिश सेनापति-विद्वान अली मरदान खान ने कश्मीर में लगभग साल भर बर्फ से ढके रहने वाले महादेव पर्वत को देखकर लिखा था, हुमा असले महेश्वर बूद… यह पारसी रचना महादेव महिमा की मिसाल है। इसका हिंदी में इस प्रकार रस लिया जा सकता है, रात मैंने देखा उनको, आश्वस्त हूं, वह थे महेश्वर / शेर की एक खाल पहने, उस रात.. / राख से ढका उनका बदन, लिपटा गले एक सांप। / उनकी जटा से बह रही गंगा, उस रात / उनके मुख पेतीन आंखें और मुखड़ा चमचमाता। / इसलिए हाथों ने मेरे कर दिया सम्मान उनका, उस रात… ।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)