
हृदय से जीकर देखें,
जिन्होंने ओशो के हिंदी प्रवचन सुने या पढ़े हैं, उन्होंने एक बात हमेशा महसूस की होगी कि कोई भी कहानी शुरू करने से पहले वह कहते, ‘सुना है मैंने।’ उन्होंने हजारों कहानियां कही हैं, जो सिर्फ किताबों में नहीं पढ़ी। जब कोई चेतना के गहरे तल से बोलता है, तो वह ज्ञान के स्रोत से जुड़ता है। ज्ञानियों ने किताबें लिखी नहीं, बोली हैं। बुद्ध की गाथाएं हों या महावीर के वचन, सारे बोले गए हैं। अपनी बात कहने का यह अंदाज बहुत प्राचीन है और समूचे विश्व साहित्य में पाया जाता है। जो भी आध्यात्मिक लोग हुए, वे सब कहानियों के जरिये ही गहरी से गहरी बात समझाया करते थे। उन दिनों लोग हृदय में जीते थे, इसलिए कहानियों का सार सीधे उनके अंतस में उतरता था।
भारतीय मनीषियों ने ज्ञान सीखने के दो तरीके बताए हैं- श्रुति और स्मृति। श्रुति, यानी श्रवण से, अर्थात सुनकर पाया हुआ; और स्मृति, यानी स्मरण द्वारा पाया गया ज्ञान। वेदों को श्रुति कहा गया, क्योंकि वेद पीढ़ी-दर-पीढ़ी सिर्फ गुरु के मुंह से सुनकर सीखे गए। सुनकर अचंभा होगा कि वेद लिखे नहीं गए। उन दिनों लिखने की कला अवगत नहीं थी। ऋषियों ने वेद देखे, उन्हें द्रष्टा कहा जाता है। उनकी अंतर की आंखों के आगे श्लोक प्रगट हुए और फिर उन्होंने दूसरे लोगों को सिखाए। उनको स्मरण रखने की कला विकसित की गई। इसलिए हजारों वर्षों तक वेद जीवित रहे।
कहानियों की विशेषता यह है कि वे सत्य को उजागर करती हैं, तथ्य को नहीं। विज्ञान तथ्य को उघाड़ता है। कहानियां प्रतीक होती हैं, जो सत्य की ओर इंगित करती हैं। तथ्यों को प्रमाण से सिद्ध करना होता है, सत्य को कोई प्रमाण नहीं चाहिए। लिखी हुई बातें तो अक्सर किताब के साथ खो जाती हैं, लेकिन सुनी हुई बातें हवा में तैरती रहती हैं और लंबे समय तक लोगों के अंतर्मन में जिंदा रहती हैं। उन्हें लोककथाएं कहते हैं। इनका लेखक कोई नहीं होता, ये कहानियां बस जनमानस में पैदा होती हैं।
ओशो बुद्ध की एक कहानी कहते हैं कि अपने शिष्य आनंद से बात करते हुए उन्होंने चेहरे पर बैठी हुई मक्खी को हाथों से उड़ाया। उसके बाद उन्होंने फिर एक बार धीरे से मक्खी को उड़ाया। आनंद ने पूछा, आपने ऐसा क्यों किया? मक्खी तो है ही नहीं। तब बुद्ध ने उनसे कहा, पहले मैंने बेहोशी में उड़ाई थी, लेकिन दूसरी बार होशपूर्वक वैसी उड़ाई, जैसी मुझे उड़ानी चाहिए थी।
अब यह एक कहानी है, जो तथ्य न हो, लेकिन सत्य है। किसी बुद्ध पंडित ने ओशो से पूछा कि यह कहानी तो बुद्ध वचन में कहीं नहीं है? ओशो ने उससे कहा, न हो तो लिख लेना, क्योंकि केवल बुद्ध जैसे जागृत व्यक्ति ही ऐसा कर सकते हैं।
लिखी हुई बातें तो किताब के साथ खो जाती हैं, लेकिन सुनी हुई बातें हवा में तैरती रहती हैं और लंबे समय तक लोगों के अंतर्मन में जिंदा रहती हैं। उन्हें लोककथाएं कहते हैं।