साहस.करके डूब गये जो , वे रस भरी जिन्दगी जीते

गीत


साहस.करके डूब गये जो , वे रस भरी जिन्दगी जीते /
डर कर बैठे रहे तटों पर ,वे अब तक रीते के रीते //
हे रससिन्धु डूब कर तुम में .मैं भी भर कर छलक रहा हूँ
अब निर्भार हुआ है जीवन ,बोझिल ही अब तलक रहा हूँ
बोझिल रातें रहीं आज तक ,बोझिल दिवस आज तक बीते /
डरकर बैठे रहे तटों पर …………………………………………//
विषय वारुणी छूट गयी है ,अब आनंदित घूम रहा हूँ ,
अमिय बूँद आ गयी अधर तक अजब नशे में झूम रहा हूँ
छाई है मदमस्त खुमारी मधु प्याले को पीते पीते /
डर कर बैठे रहे ……………………………………………/
जीवन जश्न हुआ जाता है ,पार पहुँच कर भवसागर से
अहंकार हो गया पराजित ,मात्र एक रस की गागर से
विश्व विजय मिल गयी आज तो ,मैं हारा केवल तुम जीते /
डर कर बैठे रहे तटों पर,वे अब तक रीते के रीते //,
डॉ. ध्रुवेन्द्र भदौरिया #ध्रुवांजलि ( काव्य संग्रह )

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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