
सबसे पहले मनुष्यता का पाठ
भारत आज दुनिया में सर्वाधिक युवाओं वाला देश है। ऐसे में, युवा दिवस पर स्वामी विवेकानंद के सिद्धांतों और सूक्ति-वाक्यों को याद करना बहुत जरूरी है। उनका मानना था, ‘कायरों के लिए नहीं, बल्कि सिंह गर्जना करने वालों के लिए यह देश है; संघर्ष जितना बड़ा होता है, सफलता उतनी ही बड़ी मिलती है।’ भारत के बारे में उनका दर्शन है, ‘जहां निश्छलता ही ईश्वर है; जहां अनियंत्रित ऊर्जा की सुदिशा तय होती है; जहां नर सेवा नारायण सेवा ही नहीं, बल्कि प्रत्येक जीव की सेवा होती है; जहां स्वाभिमान ही स्वतंत्रता है; जहां भ्रातृत्व ही अमर प्रेम है।’
स्वामी विवेकानंद के जीवनीकार रोमां रोलां ने लिखा है, ‘स्वामी विवेकानंद सा दूसरा होना असंभव है। वह जहां कहीं भी पहुंचे, अद्वितीय रहे।’ एक अर्थ में वह इस कलियुग में साक्षात् ईश्वर के प्रतिनिधि थे, क्योंकि सब पर प्रभुत्व ईश्वर की तरह जमा लेना उनके ही बस की बात थी। शिकागो संभाषण के बाद वहां के सबसे बड़े अखबार ने लिखा था, ‘जिस देश में धर्म का इतना बड़ा प्रवर्तक और चिंतक हो, उस देश में कोई और विद्वान जाकर धर्म की व्याख्या करे, उसका प्रचार-प्रसार करे, तो यह उसकी सबसे बड़ी मूर्खता होगी।’
स्वामी विवेकानंद का विचार था, भारत केवल बौद्धिक चिंतन तक न रहे, बल्कि व्यवहार के धरातल पर भी मानवीय उत्कर्ष का कार्य करे। उनकी दृष्टि थी कि कोई प्राणी किसी कोटि का हो, उसकी भावना का विस्तार करके उसे उन्नति के मार्ग पर रखा जा सकता है और इस तरह समस्त मानवता का कल्याण किया जा सकता है। स्वामी जी का ध्येय था कि जब भाव भरेंगे, तभी ज्ञान आएगा और जब ज्ञान आएगा, तभी अज्ञानता मिटेगी।
स्वामी विवेकानंद का राष्ट्र-दर्शन सिर्फ समृद्ध-संपन्न राष्ट्र का नहीं था, बल्कि एक स्वाभिमानी राष्ट्र का दर्शन था। उनका सांस्कृतिक राष्ट्रवाद समुन्नत भारत की कल्पना करता है। करीब तीन साल तक वह अमेरिका और इंग्लैंड में रहे, लेकिन भारत की तड़पती मनुष्यता की पीड़ा का बोध उनमें सदैव बना रहा। उन्होंने संकल्प लिया था कि जब तक यह समाप्त नहीं होगी, मैं विश्राम और विराम नहीं लूंगा।
एक बार की बात है, पंजाब के कुछ संत उनसे वेदांत पर शास्त्रार्थ करने पहुंचे। स्वामी जी उस समय सूखे से बेहाल जनता की पीड़ा के शमन के उपाय ढूंढ़ रहे थे। कई बार आग्रह करने के बाद जब स्वामी जी से वे लोग हठात् पूछने लगे कि हम आपसे वेदांत पर बात करने आए हैं। आप बात करिए या अपनी पराजय मानिए, तब स्वामी जी ने कहा, ‘आप सबको प्यास से मर रहे लोगों की पीड़ा की व्यथा नहीं है और आप वेदांत पर बात करने आए हैं? पहले आप मनुष्यता का वेदांत पढ़िए!’