पूर्व की सरकारें इसी आधार पर कराती रही हैं चुनाव, रिपोर्ट योगेश मुदगल

राज्य सरकार ने आयोग बनाने के साथ ही यह भी साफ किया है कि निकाय चुनाव में पिछड़ों को आरक्षण देने के लिए उत्तर प्रदेश नगर पालिका अधिनियम 1916 में वर्ष 1994 से व्यवस्था की गई है। इसके आधार पर रैपिड सर्वे यानी पिछड़ों की गिनती कराते हुए आरक्षण किया जाता है।
प्रदेश में वर्ष 1994 के बाद अब तक नगर निकायों के सभी चुनाव (वर्ष-1995, 2000, 2006, 2012 और 2017) अधिनियम में दिए गए इन्ही प्रावधानों और रैपिड सर्वे की रिपोर्ट के आधार पर कराए गए। अधिनियम में दी गई व्यवथा और रैपिड सर्वे के शासनादेश वर्ष 2022 को हाईकोर्ट द्वारा निरस्त नहीं किया गया है। राज्य सरकार अन्य पिछड़े वर्गों को विधि अनुसार आरक्षण दिए जाने की दिशा में हाईकोर्ट द्वारा दिए गए आदेश का अध्ययन करते हुए आगे की कार्यवाही कर रही है। यह संवैधानिक बाध्यता है कि अन्य पिछड़े वर्गों का प्रतिनिधित्व निकाय चुनाव में होना चाहिए। राज्य सरकार इस संवैधानिक बाध्यता को पूरा करने के लिए कटिबद्ध है। आरक्षण निकायों में पिछड़ा वर्ग की कुल जनसंख्या के अनुपात में दिया जाता है जो 27 फीसदी से अनधिक होता है। पिछड़ों को आरक्षण देने के लिए अधिनियम में दी गई व्यवस्था के आधार पर ही सर्वे कराया जाता है। इसके अनुसार राज्य सरकार द्वारा प्रत्येक निकाय में पिछड़ा वर्ग का सर्वेक्षण कराया जाता है। इसके लिए समय-समय पर आंकड़े उपलब्ध कराने के लिए विस्तृत दिशा निर्देश जारी किए गए हैं। वर्ष 2001 की जनगणना के बाद हुए पहले निर्वाचन के लिए अधिनियम में दी गई विधिक व्यवस्था के अंतर्गत वर्ष 2005 में रैपिड सर्वे कराने का शासनादेश जारी किया था।
पंचायतों के लिए है यह व्यवस्था
यह भी बताया गया है कि उत्तर प्रदेश पंचायत (पिछड़े वर्गों के व्यक्तियों की संख्या का अवधारण और प्रकाशन) नियमावली-1994 बनाई गई है। इसे संयुक्त प्रांत पंचायत राज अधिनियम 1947 की धारा 110 के आधार पर बनाया गया है। जब-जब देश में जनसंख्या के आंकड़े प्रकाशित होते है यानी जनगणना होती है उसके तुरंत बाद पिछड़े व्यक्तियों की संख्या का निर्धारण कराया जाता है।