अतिशय वृद्धि को पाकर पंचक्रोशात्मक (काशी) हो गये, यह वही पंचक्रोशात्मक काशी ही विश्वनाथ है

अतिशय वृद्धि को पाकर पंचक्रोशात्मक (काशी) हो गये, यह वही पंचक्रोशात्मक काशी ही विश्वनाथ है*…

काशी महात्म के अनुसार* ऋषिगण जो अमर हैं वे प्रलय के समय में श्रीसनातन महाविष्णु से पूछते हैं- हे!भगवान् यह छत्र के आकार की ज्योति जल ऊपर क्या प्रकाशित है,जो प्रलयकाल में पृथ्वी के डूबने पर भी नहीं डूबती इस पर विष्णु जी ने कहा-
हे ऋषियों लिंग रूपधारी सदाशिव महादेव का हमने तीनों लोको के कल्याण के लिए स्मरण किया था, तब वह शंभु प्रादेश भर के लिंग के रूप में हमारे हृदय से बाहर आये और पुनः अतिशय वृद्धि को पाकर पंचक्रोशात्मक (काशी) हो गये, यह वही पंचक्रोशात्मक काशी ही विश्वनाथ है

जो भूतल में विराजमान रहते हुए भी स्वयं भूमि नहीं है, जो अधस्तल में स्थित होने पर भी स्वर्ग से ऊपर हैं, जो स्वयं भूमण्डल में बद्ध होने पर भी मुक्ति प्रदान करती है, जिसमें मृत होने वाले प्राणि मात्र अमृत-पद के अधिकारी हो जाते हैं एवं त्रैलोक्य पावनी गङ्गा के तट पर देवगण द्वारा जो सदैव सेवित है, यह त्रिपुरान्तक की राजधानी श्रीकाशी अज्ञान रूप विपत्ति से संपूर्ण जगत् की रक्षा करती है ।जिस प्रकार माता, पुत्र का हित करने वाली होती है, उसी प्रकार यह काशी, मातृवत्‌ सभी जीव-जन्तुओं का हित करके सिद्धि को प्रदान करती है।
क्योंकि काशी भूलोक के समस्त क्षेत्रों में साक्षात् शिव का शरीर है, निर्विघ्न की जननी और मोक्षदायिनी, मुक्ति उसकी दासी है

पञ्चक्रोशात्मकं लिङ्गं ज्योतिरूपसनातनम्‌ |
भवानीशङ्कराभ्यांच लक्ष्मी श्रीशिवराजितम्‌ ॥ (काशी रहस्य)
अर्थात् पंचकोशात्मक भगवान्‌ शिव का लिङ्ग शाश्वत तथा ज्योति स्वरूप है। भवानी तथा शिवजी के साथ लक्ष्मी तथा भगवान विष्णु इस लिंग में विराजमान हैं।

जहांँ भगवान शिव स्वयं पार्वती के साथ राज राजेश्वर स्वरूप में विराजमान हैं। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख श्री काशी विश्वनाथ मंदिर ज्योतिर्लिंग में शिव और शक्ति दोनों विराजते हैं और ऐसा अद्भुत संयोग दुनिया में कहीं नहीं है। मान्यता है कि बाबा विश्वनाथ काशी में गुरु और राजा के रूप में विराजते हैं

देवाधिदेव शिव मात्र जल के अभिषेक से प्रसन्न होने वाले हैं, इसलिए वह आशुतोष है, समस्त विश्व का कल्याण करने वाले विश्व के नाथ विश्वनाथ हैं।
भगवान् विश्वनाथ और जगत् जननी माता पार्वती को जो जीव भक्ति भाव से किसी भी तरह का ऋतुफल विश्वनाथ जी के शिवलिंग पर अर्पण करता है दश हजार वर्षों तक रुद्रलोक में सुख भोगता है.. दुःख उसके निकट भी नही आता है…. काशी महात्म में यह भी कहा़ गया है…..

यो नारंगफलं पक्वं शिवाय विनिवेदितम् ।
अष्टलक्षं महाभोगैः क्रीडते स शिवपुरे ।।
अर्थात् जो स्त्री पुरुष पके हुवे नारंगी के फल शिव जी को अर्पित करते हैं, तात्पर्य यह कि किसी भी ऋतु फल को सश्रद्धा अर्पित करते हैं, वे आठ लाख अर्थात् अनन्त भोगों को भोगते हुए शिवलोक अर्थात् काशीपुरी में आनन्द से निवास करते है।

आज काशीवासियों ने काशी विश्वनाथ मन्दिर के सीईओ श्री सुनील वर्मा के सहयोग से विश्व के कल्याणार्थ और वैश्विक महामारियों व् अज्ञात आपदाओं से समस्त काशी और समस्त विश्व की रक्षा हेतु विश्व के नाथ विश्वनाथ दरबार में विश्वनाथ जी के शिवलिग पर उनके प्रिय ऋतुफल, मिष्ठान,पुष्प और ऋतु फल से निर्मित डंढई अर्पित कर विश्वकल्याणार्थ प्रार्थना पूजन किया। विशिष्ट षोडोपचार पूजन के साथ बाबा का सप्तफल नारंगी फल,रस भरी मकोय,बेर ,अमरूद,देशी संतरा,काबुल का खंडार अनार,शरीफा शुद्ध गाय दूध 5 ली, गंगा जल,केसरिया पेड़ा,दही,शहद, अमरूद की डंडई,संतरे की डंडई, मलइयों,मुस्कंबर व चंदन इत्र और धोती दुप्पटा साड़ी और पूजन सामग्री साथ धतूरे की माला,बिल्व पत्र की माला,गुलाब की माला,गेंदे की माला,,गुलदावरी की माला,दौने की माला,मदार की माला सहित कुमुदनी की माला से श्रंगार किया गया..कार्यक्रम में मुख्य रूप से अजय शर्मा, डा.हिमांशु राज़,अधिवक्ता शशांक शेखर त्रिपाठी , विनय पाण्डेय,अनक उपाध्याय सहित बड़ी संख्या में शिवभक्त उपस्थित रहे.

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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