पानी परात के छुए नहीं नैनन अश्रु से पग धोये सुदामा जैसा मित्र कहा

रासलीला अहरौरा नगर के सत्यानगंज मोहल्ले में स्थित श्री राधा कृष्ण मंदिर परिसर में चल रहे रासलीला के आठवें दिन सुदामा चरित्र का मंचन किया गया जिसमें बचपन में भगवान कृष्ण सादिपन गुरु के पास शिक्षा ग्रहण करने के लिए जाते हैं तो रास्ते में सुदामा जी के पाव में कंटक लग जाते हैं और जोर जोर से चिल्लाने लगते हैं आवाज सुन कर कान्हा उनके पास पहुंच कर पाव में लगें कंटक को निकाल देते हैं जिसके बाद दोनों लोगों में घोर मित्रता हो जाती है फिर दोनों साथ-साथ पढ़ने के लिए जातें हैं विघालय में सुदामा जी एक दिन विलंभ से पहुंचते हैं तो सांदीपनी ऋषि उन्हें दंड देते हैं जंगल में जाकर लकड़ियां बिनकर लाने के लिए कहते हैं फिर अवसर देख कान्हा भी साथ जाने के लिए तैयार हो जातें हैं साथ देखकर गुरू जी दो मुट्ठी चने देते हैं रास्ते में भुख लगी तो खा लेना दोनों लोग निकल पड़ते हैं जंगल की ओर रास्ते में सुदामा जी को तेज से भुख लगी भुख मिटाने के लिए गुरु जी के दिए हुए चने सुदामा जी खा जाते हैं और कृष्ण का भी हिस्सा सुदामा जी चने खा जाते हैं जब कृष्ण को भूख लगी तो गुरु जी के दिए हुए चने सुदामा जी से मांगने लगें सुदामा जी ने कहा मित्र मैंने आपके भी चने खा लिए फिर भगवान कृष्ण सादींपन गुरु जी के गुरूकुल में पहुंचे और सुदामा जी के सरी गलतियां बता डाली फिर कान्हा ने गुस्से में जन्म जन्मांतर तक दिन हिन हो जाओ ऐसा श्राप दे दिया सुदामा रोने लगे फिर अचुक उपाय गुरु जी ने किया सुदामा को कृष्ण का नाम न भुलने की सलाह दी और कृष्ण को सुदामा का मैत्रिक संबंध हमेशा याद रखने के लिए कहा और दोनों को विदा किया कुछ दिन बितने पर सुदामा जी की पत्नी सुशिला ने अपने पति सुदामा जी से अपने मित्र कृष्ण से मिलने के लिए जीद किया सुदामा मित्र कृष्ण से मिलने के लिए द्वारिका पुरी जा पहुंचे जहां द्वार पालों द्वारा लज्जित होना पड़ा लेकिन ज्योंहि कृष्ण को यह बात पता चली कि सुदामा जी आए हैं अपने महलों से भागे भागे दौड़े दौडे अपने सखा से मिलने के लिए महलों के बाहर जा पहुंचे और गले से लगाया और दोनों मित्र फुट फुट कर अश्रु बहाने लगें अपने साथ महलों के भीतर ले गए और सुदामा जी को ब्राह्मण मानकर अपने अश्रुओं से ही उनके पग धोने लगे सुंदर वस्त्र अलंकार इत्यादि सुदामा जी को धारण करवाया फिर भगवान ने सुदामा जी से भेंट के रूप में भाभी सुशिला के दिए हुए तंदुल के दो मुट्ठी भर खा लिया ज्योंहि तीसरी मुठ्ठी खानी चाही रूक्मणी ने हाथों को पकड़ लिया और मना कर दिया फिर भगवान कृष्ण और सुदामा जी का भव्य आरती किया गया ।।।