
मुंबई में महेंद्र पचौरी को मिली थी महेश पंडित नाम की पहचान
एटा। जिले के प्रसिद्ध साहित्यकार रहे महेंद्र कुमार पचौरी को मुंबई में अलग पहचान मिली। वहां उन्हें महेश पंडित का नाम दिया, इससे ही वह काव्य जगत में प्रसिद्ध हुए। एटा में 1950 में जन्मे महेंद्र कुमार पचौरी ने हिंदी के अलावा अंग्रेजी और चित्रकला में भी स्नातकोत्तर की शिक्षा ग्रहण की। इसके बाद भारतीय इंटर कॉलेज न्यौराई में शिक्षण कार्य करने लगे। साहित्य के साथ ही चित्रकला में भी वह निपुण थे। राष्ट्रीय स्तर के पत्र-पत्रिकाओं में उनके साहित्य का लगातार प्रकाशन होता रहता था।
वहीं आकाशवाणी और दूरदर्शन पर उनके कई कार्यक्रम हुए। काव्य मंचों पर उनकी उपस्थिति अन्य कवियों को भी ऊर्जा देती थी।
साहित्य संस्कार उन्हें अपने मामाजी कविवर पंडित दयाशंकर द्विवेदी शंकर जलेसरी से प्राप्त हुए। बाद में अपने मामाजी के विवेकानंद ज्योति नामक मनोरम प्रबंध काव्य का संपादन भी किया। जिसकी भूमिका राष्ट्रीय कवि पं. देवी प्रसाद राही कानपुर द्वारा लिखी गई थी। महेश पंडित ने कई गीत, गजल संग्रह और खंडकाव्य, उपन्यास लिखे। जिनमें शख्सियत का कत्ल, सिंहासन का रथ, गीतप्रिया, दर्पण चटक गया, टुकड़े-टुकड़े धूप, पाप और पुण्य, चांद के धब्बे, नीली झील, झरोखे उल्लेखनीय हैं।
सरस्वती कुमार दीपक ने दिया था नाम
एटा के ही यशस्वी कवि प्रभात किरण जी के सानिध्य में महेंद्र कुमार पचौरी मुंबई पहुंचे। वहां अपनी कविताओं और गीतों से काव्य मंचों और गोष्ठियों में प्रसिद्ध हुए। उस समय के काव्यऋषि सरस्वती कुमार दीपक ने उनको महेश पंडित नाम देकर उनकी एक अलग पहचान बना दी। उनकी कविता में राष्ट्रीयता की प्रखर भवानुभूति का पग-पग पर दर्शन होता है। उनके उपन्यास आदि साहित्यिक लेखन में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रभाव मुखर रहा है। उनकी कृति कविता संग्रह शख्सियत का कत्ल को 1987 में अखिल भारतीय साहित्य परिषद देवरिया द्वारा श्रेष्ठ कृति के रूप में सम्मानित किया गया था। -डॉ. प्रेमीराम मिश्र, पूर्व विभागाध्यक्ष हिंदी, जेएलएन डिग्री कॉलेज