सच्चाई लिखना क्या पत्रकार का अपराध बन गया है?

एटा

पत्रकार की कलम समाज का आईना होती है। उसका धर्म है अन्याय, शोषण और तंत्र की खामियों को उजागर कर सरकार और जनमानस तक सच्चाई पहुँचाना। लेकिन जब सच्चाई बोलने वाले को ही इस तरह की प्रताड़ना का शिकार होना पड़े, तो सवाल उठना लाज़िमी है—क्या आज के दौर में सच बोलना पत्रकार के लिए अपराध बन गया है?

ऐसी ही एक दिल दहला देने वाली घटना एटा मेडिकल कॉलेज में सामने आई। एक स्थानीय पत्रकार का 10 वर्षीय बेटा बीती रात करीब 12:10 बजे अचानक तेज बुखार और बदन में जलन की शिकायत के साथ बीमार पड़ा। पत्रकार और उसकी पत्नी घबराए हुए बच्चे को लेकर सीधे मेडिकल कॉलेज के इमरजेंसी वार्ड पहुंचे।

“थर्मामीटर ही नहीं है…”

जब पत्रकार ने डॉक्टर से बच्चे की हालत बताई, तो डॉक्टर का जवाब चौंकाने वाला था:
“हमारे पास थर्मामीटर ही नहीं है, वह खराब है। नया मंगाने के लिए रिक्वेस्ट भेज दी गई है। बुखार का पता कैसे लगाएं?”

यह सुनकर पत्रकार की पत्नी ने डॉक्टर से विनती की कि बच्चे को पीडियाट्रिक वार्ड में रेफर कर दिया जाए। काफी आग्रह के बाद बच्चे को पीडिया वार्ड भेजा गया, जहां कुछ दवाएं दी गईं। सुबह होते-होते डॉक्टरों ने कई ब्लड टेस्ट और अल्ट्रासाउंड की सिफारिश की।

“तुम पत्रकार हो?”
इसके बाद जब पत्रकार अपने बच्चे का अल्ट्रासाउंड कराने रेडियोलॉजिस्ट डॉ. राजीव मोदी के पास पहुँचा, तो उनके हाथ में माइक आईडी देखकर डॉक्टर ने कहा, “तुम पत्रकार हो?

डॉक्टर ने उनके खिलाफ छपी खबरें दिखाते हुए कहा, “प्रेस वाले सब एक जैसे होते हैं, जो मन में आए छाप देते हैं। इसलिए हम पत्रकारों का काम नहीं करते। जो हमें परेशान करेगा, हम भी उसे परेशान करेंगे।”

पत्रकार ने हाथ जोड़कर विनती की कि बच्चे की तबीयत बेहद खराब है, वह किसी खबर का लेखक नहीं है। लेकिन डॉक्टर का जवाब आया —
” परसों अल्ट्रासाउंड करेंगे, आज नहीं। और जाकर अपने पत्रकार साथियों को बता देना कि डॉक्टर ने अल्ट्रासॉउन्ड से इनकार किया है। और वजह बता देना उनके खिलाफ खबरें छापते हैं इस वजह से आपके बच्चे को भुगतना पड़ रहा है “

प्राचार्या से संपर्क का प्रयास भी विफल
पत्रकार ने जब इस पूरे मामले में मेडिकल कॉलेज की प्राचार्या से बात करनी चाही, तो उनका मोबाइल फोन कॉल रिसीव नहीं किया गया।

कलम की स्याही से डरने लगे हैं सिस्टम के पहरेदार?

यह घटना सिर्फ एक पत्रकार की नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक तंत्र के लिए एक सवाल है। क्या अब कलम से सच्चाई लिखना गुनाह है? क्या अपने बच्चों का इलाज कराना अब पत्रकारों के लिए भी एक विशेषाधिकार रह गया है?

जहाँ एक ओर सरकार स्वास्थ्य सेवाओं के सुधार की बात करती है, वहीं दूसरी ओर एक बीमार बच्चे का इलाज इस आधार पर टाल दिया गया कि उसका पिता एक पत्रकार है।

यह सिर्फ एक पत्रकार का सवाल नहीं, समाज के हर उस इंसान का सवाल है जो सच्चाई बोलने का साहस रखता है।

(संवाददाता प्रवीन भारद्वाज दैनिक भास्कर एटा)

About The Author

निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

Learn More →

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

अपडेट खबर के लिए इनेबल करें OK No thanks