देशी दाल मिले तो जरूर खरीदिए और अगर पारंपरिक तरीके से बनाई गई दाल मिल जाए तो अवश्य खरीदिए

अरहर की दाल
देखने में सुंदर नही है लेकिन स्वाद की सौ प्रतिशत गारंटी है क्योंकि ये पारंपरिक तरीके से बनाई देशी अरहर की देशी दाल है!
बढ़िया पीले रंग की चमक दार बिन छिलके वाली बड़े बड़े दाने वाली पॉलिश वाली दाल क्यों खरीदनी ?

अरे भई! दाल हमको खाना है! पहननी नही है उसमें सुन्दरता का क्या काम है?
देशी दाल मिले तो जरूर खरीदिए और अगर पारंपरिक तरीके से बनाई गई दाल मिल जाए तो अवश्य खरीदिए।
अब आप सोच रहे होंगे कि मैं पारंपरिक तरीके पर इतना जोर दे रही हूं आखिर ये पारंपरिक तरीका क्या होता है?
जब नीलगाय, जंगली सुअर, छुट्टा पशुओं की अधिकता नही थी तब वर्ष भर खाने के लिए पर्याप्त मात्रा में अरहर बोई जाती थी और साल भर के लिए दाल बनाकर लोग संरक्षित कर लेते थे क्योंकि हमारे सीतापुर क्षेत्र में अरहर दाल ही प्रतिदिन बनती है। उड़द दाल तो कभी कभार मन बदलने के लिए या शुभ कार्य में या फिर सर्दियों में सगपहिता के लिए बनती थी।
अब अरहर भले खेत में नही बोई जाती है लेकिन घरों में अब भी रोज अरहर दाल ही बनती है।
अब पारंपरिक तरीके की बात करते हैं।
जब गर्मियों में अरहर कटकर खलिहान में अरहर की भीरी रखी जाती थी तब एक बड़ा काम अरहर की पीटना और दाने अलग करना होता था। छकनी से अरहर पीटी जाती थी और फिर जिन फलियों में दाने रह जाते थे उन्हे मुंगरी से पीटकर अलग करते थे। जब अरहर के डंठल से दाने अलग हो जाते थे तब अरहर से दाल बनाने की बारी आती थी ।
खपरी चढ़ा कर पहले अरहर को सेंका यानि कौरा जाता था और फिर चकिया में दरा जाता था।
पहली बार में जिनके छिलके नही उतरते थे उन्हे दुबारा पानी के छींटे मारकर नम करके फिर उखल मूसल से यानि ओखरी पहरूवा से कूट कर छिलका उतारते थे जिसे दाल छांटना कहते थे।
अरहर से दाल बनाने की प्रक्रिया में जो दाल टूट जाती थी उन्हे साफ करके संभाल कर रख लिया जाता था उसमे प्याज मिर्च मसाला डालकर बढ़िया मोटी सी चूनी की रोटी बनती थी।
अरहर को सेंककर बनी अरहर दाल से जब दाल बनती थी तो उसकी सोंधी खुशबू मन मोह लेती थी और ये दाल जब सिल पर हल्दी, मिर्ची, लहसुन का मसाला पीसकर डालकर बनती थी और पकने के बाद खटाई या कच्चे आम डाले जाते थे तब ये इतनी स्वादिष्ट दाल बनती थी कि छौंकने की जरूरत ही नहीं महसूस होती थी।
मेरे हाथ में जो दाल है ये अभी सिर्फ दली हुई है इसलिए इसमें छिलका अधिक है अभी इसे छांटना बाकी है जब ये ओखली या ढेंका में छांटी जायेगी तब इसका छिलका और कम हो जायेगा।
अब जब ढेंका नही है तो बोरा बिछा कर या गाली मे डालकर पहरुआ से छांट लिया जायेगा।
उम्मीद है कि पारंपरिक तरीके से बनी दाल अब आप सबको मालूम हो गई होगी।
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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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