
स्थानीय जनता की क्या चाहत है इस पर स्थापित राजनितिक दलों को जरा भी परवाह नहीं है. जबकि बाहरी प्रत्याशी को आपसे कोई लेना देना नहीं है उनको सिर्फ वोट बैंक से मतलब है.
पैसे के दम पर लोग चुनाव जीत जाएंगे लेकिन जनता की भावनाओं की कदर तो करेगा क्षेत्र का प्रत्याशी ही जो पैसों से कमजोर है वह उतना पैसा खर्च नहीं कर सकेगा, वह आर्थिक रूप से मजबूत नहीं है. बड़ी पार्टिया पूंजीवाद को बढ़ावा दे रही है इसके चलते भ्रष्टाचार बढ़ रहा है और आगे भी भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा.
विकास का मॉडल दिखाकर लोगों की भावनाओ का दोहन करके, लोक लुभावन योजनाओं का ढिंढोरा पीट कर, वोट लेकर जीत जाएंगे लेकिन जनता की मूलभूत सुविधाओं के लिए जनता भटकती रहेगी. जैसे आधार कार्ड अपडेट कराने महीनो लोगों को भटकना पड़ता है. पैसा देने के बाद काम होते हैं. किसान अपनी जमीन का नाप कराने, फौती उठाने, नाम दर्ज कराने के लिए भी पैसा देने के बाद भी काम नहीं होते. पटवारी के चक्कर काटते रहते हैं. जरा जरा से काम के लिए लोग परेशान है. सुशासन की बात करने वाली सरकार सुशासन कहां दे पा रही है.
बहोरीबंद विधान सभा क्षेत्र के रीठी में शराब दुकान हटाने व अवैध रूप से चल रही गाव गाव में पैकारी को बंद करने के लिए बस स्टैंड पर क्षेत्रीय जनों ने धरना प्रदर्शन किया. क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि व प्रशासन ने आश्वासन तो दिया लेकिन शराब दुकान को चंद कदम आगे बढ़ा दिया और पहले एक दुकान थी अब दो दुकान धडल्ले से चलाई जा रही है इसका विरोध न तो सत्ताधारी दल और विपक्ष ने बिलकुल नहीं किया. राजनैतिक दलों को जनता की भावनाओं की कोई कदर ही नहीं है.
बड़े राजनीतक दल जनता को भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल कर रही है. लोक लुभावन नीतियों के चक्कर में पड़कर ऐसी पार्टियों को लोग वोट देते रहे हैं. बड़ी पार्टिया जनता के साथ खेल रही है, पूंजीवाद का समर्थन कर रही है. दारू मुर्गा बटवा कर अनैतिक रूप से चुनाव जीते जाते हैं.
जो प्रत्याशी एक विधानसभा में चुनाव जीतने के लिए करोड़ों रुपए खर्च करेगा उससे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की उम्मीद भला कैसे की जा सकती है. वह जनता को समझेगा ही नहीं.
ऐसे शातिर लोग समीकरण बैठाकर डमी कैंडिडेट खड़ा करके चुनाव जीत जाते हैं. क्षेत्रीय प्रत्याशियों को महत्व न देकर, प्रत्याशी न बनाकर बड़ी पार्टिया पूँजीवाद को बढ़ावा दे रही है, निरंकुश तानाशाह प्रशासन को बढ़ावा दिया जा रहा है. ऐसी स्थिति में जनता के सामने एक ही विकल्प है इनको नकार दिया जाए. जबकि क्षेत्रीय प्रत्याशियों को मैदान में उतरने से क्षेत्र में सुधार होगा. क्षेत्रीय प्रतिनिधि जनता से डर कर रहेगा, सब की बात मानेगा और यदि वह गड़बड़ करेंगा तो लोग उसे वोट नहीं देंगे. साथ ही क्षेत्रीय प्रत्याशी सबसे दबकर रहेगा सब की बात सुनेगा.
यहां के दलाल भी नहीं चाहते कि क्षेत्रीय व्यक्ति को वोट मिले क्योंकि बाहरी व्यक्ति होगा तभी तो दलालों की पूछ परख होगी. क्योंकि क्षेत्रीय व्यक्ति से तो लोग कभी भी जाकर सीधे अपनी बात और समस्या रख सकते हैं और जनता का काम तत्काल हो जाएगा ऐसे में दलाली खाने वालों की दलाली बंद हो जाएगी. क्षेत्र के दलाल कभी नहीं चाहते कि क्षेत्रीय व्यक्ति को विधान सभा का टिकट मिले वह चाहते हैं कि प्रत्याशी दूर का रहे, बड़े पैसे वाला हो, जिससे जनता उससे सीधे बात न कर सके, जनता उससे मिलने से डरे, तभी तो यह लोग दलाली खा सकेंगे. यदि क्षेत्र का व्यक्ति विधायक बन जाएगा उस दिन दलालों की दलाली बंद हो जाएगी. जो कर्मचारी नेता कर्मचारियों की दलाली कर रहा है वह भी नहीं चाहते क्योंकि क्षेत्र के लोग तो उनकी औकात जानते हैं और ऐसे लोगों को जरा भी महत्व नहीं मिल पायेगा.
जिनको स्थापित पार्टी के जनप्रतिनिधि पसंद नहीं हो वह क्या करें यदि नोटा के विकल्प पर विचार करें तो भविष्य में दोनों पार्टियों को सोचना पड़ेगा असल में क्षेत्रीय प्रत्याशी के पास नम्बर दो का अनाप शनाप पैसा भी नहीं है इसलिए वह शांत हो जाता है. यदि एक बार बड़ी पार्टियों को मजबूर कर दिया जाए और बाहरी प्रत्याशियों को औकात दिखाइ जाए और नोटा के विकल्प को चुना जाए तो फिर स्थापित दल विवश होकर क्षेत्रीय व्यक्ति को तवज्जो देगे. जनता को समझना चाहिए कि वह भेड़ बकरी नहीं है.