“आपातकाल लागू है, जो भी सवाल पूछेगा उसे जेल में डाल दिया जाएगा।”

“आपातकाल लागू है, जो भी सवाल पूछेगा उसे जेल में डाल दिया जाएगा।”

संभल के पत्रकार संजय राणा को जेल भेज दिया गया। उन्हें मोटे रस्से में बांधकर पुलिस थाने ले गई। उनका अपराध यह था कि उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार में राज्यमंत्री गुलाब देबी से गांव के विकास को लेकर सवाल पूछा था। हालांकि, आज उन्हें जमानत मिल गई है लेकिन जमानत का नहीं है। सवाल यह है कि यह घटना इतनी ही मामूली है जितनी दिखती है?

पत्रकार ने मंचासीन मंत्री जी से पूछा, “गांव में एक भी बारातघर नहीं है, ना ही यहां पर सरकारी शौचालय है, आपने कहा था कि मंदिर से लेकर इस रोड को पक्का कराऊंगी, अभी तक ये रास्ता कच्चा है, बाइक से क्या पैदल चलने वाले लोग परेशान हो जाते हैं। आपने देवी मां के मंदिर की बाउंड्री का वादा भी किया था, आपने अभी तक उस पर भी कार्रवाई नहीं की, आपके दफ़्तर पर गांव के लोग गए, वहां भी सुनवाई नहीं हुई।”

मंत्री के साथ मौजूद किसी महिला ने टोका, “आप समस्या रख रहे हो या अपना प्रचार कर रहे हो?”

पत्रकार ने कहा, “जब तक जनता की आवाज़ आप तक नहीं पहुंचेगी, आप दावा करते हो कि काम किया है, लेकिन एक गांव में कोई काम ही नहीं हुआ तो हम क्या कहेंगे?”

पत्रकार गांव के लोगों से पूछता है, ‘आपके गांव में विकास हुआ है’

लोगों का जवाब मिला, ‘कोई काम नहीं हुआ है’

मंत्री जी कहती हैं, “तेरी निगाहें मैं बहुत देर से पहचान रही थी, जब तू वहां खड़ा था तब भी मैं तेरी निगाहें पहचान रही थी, जो बातें तूने कहीं हैं, ये सारी बातें ठीक हैं, अभी समय नहीं निकला है, गांव कुंदनपुर तू भूल गया, कुंदनपुर भी मेरा, बुद्धनगर भी मेरा है, ये दोनों ही गांव मेरे हैं, मैंने जो भी वादे किए हैं, मैं उन्हें पूरा करूँगी। जो काम तुमने बताए हैं, सभी काम होंगे।”

इस कार्यक्रम के खत्म होने के बाद पत्रकार के खिलाफ एक बीजेपी कार्यकर्ता से मारपीट के आरोप में केस दर्ज हुआ और उसे गिरफ़्तार कर लिया गया। वहां मौजूद चश्मदीदों ने बीबीसी को बताया कि वहां पर कोई झगड़ा नहीं हुआ था।

अब सवाल है कि पत्रकार को गिरफ्तार क्यों किया गया? क्या पत्रकार ने कोई गलत बात कही थी? क्या सवाल पूछना अपराध है? अगर वह आम युवक होता तब भी क्या सवाल पूछना अपराध है? क्या भारत में लोकतंत्र नहीं है? एक बड़े प्रदेश की मंत्री में एक सवाल सुनने भर का धैर्य न हो तो इसे क्या कहेंगे? क्या यह घटना दूसरे पत्रकारों में भय पैदा नहीं करेगी? क्या यह सरकार 140 करोड़ लोगों को गूंगा बना देना चाहती है? पूरे देश का मीडिया चरणवंदना में लगा है, कहीं छिटपुट सवाल भी बर्दाश्त नहीं हैं? आपातकाल कैसा होता है? फासीवाद कैसा होता है? तानाशाही किसे कहते हैं? क्या इन्हीं हरकतों की वजह से भारत प्रेस फ्रीडम के मामले में ​फिसड्डी नहीं बना हुआ है? क्या यह लोकतंत्र की हत्या करने वाली मानसिकताओं का नतीजा नहीं है?

यही बात राहुल गांधी ने कह दी है जिसके बाद पूरी सरकार और भाजपा बौखलाई है। राहुल को छोड़ दीजिए। आप जो कर रहे हैं, वह पूरी दुनिया देख रही है। इन्हीं कृत्यों की वजह से दुनिया के महान लोकतंत्र चुनी हुई तानाशाही कहा जा रहा है। आपके कृत्य भारत को रोज शर्मिंदा कर रहे हैं।”आपातकाल लागू है, जो भी सवाल पूछेगा उसे जेल में डाल दिया जाएगा।”

संभल के पत्रकार संजय राणा को जेल भेज दिया गया। उन्हें मोटे रस्से में बांधकर पुलिस थाने ले गई। उनका अपराध यह था कि उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार में राज्यमंत्री गुलाब देबी से गांव के विकास को लेकर सवाल पूछा था। हालांकि, आज उन्हें जमानत मिल गई है लेकिन जमानत का नहीं है। सवाल यह है कि यह घटना इतनी ही मामूली है जितनी दिखती है?

पत्रकार ने मंचासीन मंत्री जी से पूछा, “गांव में एक भी बारातघर नहीं है, ना ही यहां पर सरकारी शौचालय है, आपने कहा था कि मंदिर से लेकर इस रोड को पक्का कराऊंगी, अभी तक ये रास्ता कच्चा है, बाइक से क्या पैदल चलने वाले लोग परेशान हो जाते हैं। आपने देवी मां के मंदिर की बाउंड्री का वादा भी किया था, आपने अभी तक उस पर भी कार्रवाई नहीं की, आपके दफ़्तर पर गांव के लोग गए, वहां भी सुनवाई नहीं हुई।”

मंत्री के साथ मौजूद किसी महिला ने टोका, “आप समस्या रख रहे हो या अपना प्रचार कर रहे हो?”

पत्रकार ने कहा, “जब तक जनता की आवाज़ आप तक नहीं पहुंचेगी, आप दावा करते हो कि काम किया है, लेकिन एक गांव में कोई काम ही नहीं हुआ तो हम क्या कहेंगे?”

पत्रकार गांव के लोगों से पूछता है, ‘आपके गांव में विकास हुआ है’

लोगों का जवाब मिला, ‘कोई काम नहीं हुआ है’

मंत्री जी कहती हैं, “तेरी निगाहें मैं बहुत देर से पहचान रही थी, जब तू वहां खड़ा था तब भी मैं तेरी निगाहें पहचान रही थी, जो बातें तूने कहीं हैं, ये सारी बातें ठीक हैं, अभी समय नहीं निकला है, गांव कुंदनपुर तू भूल गया, कुंदनपुर भी मेरा, बुद्धनगर भी मेरा है, ये दोनों ही गांव मेरे हैं, मैंने जो भी वादे किए हैं, मैं उन्हें पूरा करूँगी। जो काम तुमने बताए हैं, सभी काम होंगे।”

इस कार्यक्रम के खत्म होने के बाद पत्रकार के खिलाफ एक बीजेपी कार्यकर्ता से मारपीट के आरोप में केस दर्ज हुआ और उसे गिरफ़्तार कर लिया गया। वहां मौजूद चश्मदीदों ने बीबीसी को बताया कि वहां पर कोई झगड़ा नहीं हुआ था।

अब सवाल है कि पत्रकार को गिरफ्तार क्यों किया गया? क्या पत्रकार ने कोई गलत बात कही थी? क्या सवाल पूछना अपराध है? अगर वह आम युवक होता तब भी क्या सवाल पूछना अपराध है? क्या भारत में लोकतंत्र नहीं है? एक बड़े प्रदेश की मंत्री में एक सवाल सुनने भर का धैर्य न हो तो इसे क्या कहेंगे? क्या यह घटना दूसरे पत्रकारों में भय पैदा नहीं करेगी? क्या यह सरकार 140 करोड़ लोगों को गूंगा बना देना चाहती है? पूरे देश का मीडिया चरणवंदना में लगा है, कहीं छिटपुट सवाल भी बर्दाश्त नहीं हैं? आपातकाल कैसा होता है? फासीवाद कैसा होता है? तानाशाही किसे कहते हैं? क्या इन्हीं हरकतों की वजह से भारत प्रेस फ्रीडम के मामले में ​फिसड्डी नहीं बना हुआ है? क्या यह लोकतंत्र की हत्या करने वाली मानसिकताओं का नतीजा नहीं है?

यही बात राहुल गांधी ने कह दी है जिसके बाद पूरी सरकार और भाजपा बौखलाई है। राहुल को छोड़ दीजिए। आप जो कर रहे हैं, वह पूरी दुनिया देख रही है। इन्हीं कृत्यों की वजह से दुनिया के महान लोकतंत्र चुनी हुई तानाशाही कहा जा रहा है। आपके कृत्य भारत को रोज शर्मिंदा कर रहे हैं।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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