ब्रज क्षेत्र के लक्खी मेलों में एक मेला है “मार्ग शीर्ष मेला”,

शुक्रर सोंरों,भारतवर्ष में मेलों के आयोजन लोक मानस के उल्लास के कारण बनते हैं. हमारे ब्रज क्षेत्र में भी मेलों के ये आयोजन
आयेदिन देखने को मिलते रहते हैं. ये मेले मेलमिलाप के
केन्द्र भी बनते हैं और आनंद के कारक भी. उत्तर भारत के इस महा मेले में , भारत के कौने-कौने से विभिन्न अखाड़ों से सम्बद्ध संत- महात्माओं का शुभागमन भी होता है. वर्तमान में कासगंज जनपद -प्रशासन का विशेष सहयोग इस मेले के लिए एक वरदान के समान है.
ब्रज क्षेत्र के लक्खी मेलों में एक मेला है “मार्ग शीर्ष मेला”, ब्रज लोक में इसे ” मेला मार्ग श्री ” नाम से जाना जाता है.
जो अग्रहायण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी से आरम्भ होकर अग्रहायण मास की पूर्णिमा तक चलता है, इन पांच दिनों में स्नान -ध्यान आदि के आनंद की निरंतरता बनी रहती है. उसके बाद भी “मार्गश्री” का ये मेला एक माह तक गतिमान रहता है.
ये मेला पतित पावनी गंगा -तट ( समीपस्थ ) आदि वराह क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले “सोरों” (सूकर क्षेत्र) नामक धार्मिक नगर
में लगता है. जिसमें दूर -दूर से पधारे दूकानदार अपनी विभिन्न प्रकार की दूकानें लगाते हैं. खानपान की दूकानें, खजला आदि ( विभिन्न प्रकार की मिठाइयों की) दूकानें, महिलाओं के उपयोग ( चूडी़-बिन्दी,चुटीले,क्रीम-पाउडर एवं उनके श्रृंगार की वस्तुओं की दूकानें, ऊनी वस्त्रों की दुकानें, संगीत के लोक-वाद्यों ढोलक , मंजीरे ,ढोल-ढप,कंजरी आदि
संगीत वाद्यों की दूकानें,धार्मिक पुस्तकें , खेल-खिलौनों की दूकानें, चकला-बेलन, कडा़ही,फलों में नारंगी एवं संतरा आदि की दूकाने लगीं दीखती हैं. सभी प्रकार की दूकानों की सजावट देखने योग्य होती है. इस मेले में आए आसपास के दर्शानार्थी जन,अपनी आवश्यकता की वस्तुएं खरीद कर ले जाते हैं. बच्चों के झूले , सर्कस, सिनेमा,जादूगर, आदि मनोरंजन के साधन भी इस लक्खी मेले में दिखाई देते हैं. दर्शनार्थियों की भारी भीड़ यहां आया करती है.
सोरों के इस विशाल और लक्खी मेले में राजस्थान, मध्यप्रदेश ,
हरियाणा, उत्तराखंड आदि प्रांतों से ऊंट,घोड़े आदि पशुओं के
व्यापारीगण अपने पशुओं को बेचने आते हैं . लगभग १५ दिनों तक लगने वाला ये मेला अपनी विशालता, दिव्यता और
भव्यता के लिए बहुत ही प्रसिद्ध है.
सोरों (सूकर क्षेत्र ) जगत की उत्पत्ति का केन्द्र माना गया है.
तीर्थ पुरोहितों के लिए ये स्थान जगत विख्यात है. वर्तमान में “सोरों तीर्थ ” भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के जनपद कासगंज का नगर है. जो मथुरा -बरेली हाईवे पर स्थित है. “यहां मथुरा के ( माथुर चतुर्वेदी) समाज के स्वजनों का मुण्डन संस्कार होना ” गौरव का विषय है.
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सोरों जी को क्यों कहा जाता है सोरों ?
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भगवान विष्णु ने “हिरण्याक्ष ” दैत्य का वध करने के लिए ” वराह ” अर्थात सूकर का रूप धारण किया था. वराह भगवान विष्णु के तृतीय अवतार माने गए हैं. जिन्होंने
उक्त दैत्य का वध करने के बाद, यहीं पर अपनी देह का
परित्याग किया. तभी से सोरों जी को “सूकर क्षेत्र ‘ कहा जाने लगा.
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सोरों का प्राचीन इतिहास
???????? इस तीर्थ का पौराणिक नाम
” ऊखल तीर्थ ” है. वराह अवतार से पूर्व “कोका मुख – कुब्जाग्रक” तीर्थ नाम से यह विख्यात था. वर्तमान में इसे
सोरों ( सूकर क्षेत्र) कहा जाता है. सूकर क्षेत्र को चालुक्य वंश,
सोलंकी क्षत्रियों की राजधानी भी माना जाता है.इतिहासवेत्ता
मानते हैं किया( ई. ९०० के लगभग ) यहां के शासक “सोमदत्त
सोलंकी रहे थे.
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यहां “वराह भगवान का भव्य मंदिरा” है. जिनके दर्शनों के लिए आज भी दूरस्थ प्रदेशों से श्रद्धालु भक्तजन आये दिन आते ही रहते हैं और “भगवान वराह ” के दर्शन करके स्वयं को
धन्य मानते हुए परमानंद का अनुभव करते हैं. कहा जाता है कि भगवान विष्णु की देवताओं द्वारा स्तुति करने पर भगवान वराह का रूप धारण कर इसी सोरों (सूकर क्षेत्र) में ब्रह्मा जी की नासिका से प्रकट हुए ” भगवान वराह ” ने “हिरण्याक्ष्य” नामक राक्षस का विनाश कर,पृथ्वी को मुक्त करके अपने अवतार का उद्देश्य पूरा कर ,निज देह का परित्याग सोरों (सूकर क्षेत्र) की इसी पावन धरा पर किया था. इस मंदिर के अतिरिक्त सोरों में
विभिन्न हिन्दू देवी-देवताओं के भव्य मंदिर हैं. यहां की “हरिपदी
गंगा सरोवर ” बडा़ ही दिव्य दर्शनीय एवं विशाल है, जिसमें ( अपने परिजनों की ) अस्थियां विसर्जन के लिए राजस्थान, मध्य-प्रदेश आदि प्रांतों से तीर्थ यात्री निरन्तर आते ही रहते हैं.
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श्री रामचरित मानस के रचयिता संत तुलसीदास का जन्म इसी
सोरों ( सूकर क्षेत्र) में हुआ था. इनकी शिक्षा-दीक्षा भी यहीं “श्री नृसिंह पाठशाला” में सम्पन्न हुई थी.श्री गुरु नरहरि ने उन्हें
शिक्षा दी थी. संत तुलसीदास की सहधर्मिणी कवियित्री
“रत्नावली” का मायिका बदरिया में आज भी यहां विद्यमान है उनके वंशज पाठक ब्राह्मण! इस क्षेत्र में बहुतायत में हैं. मेरी
पुत्रवधू भी इसी “पाठक गोत्रीय -वंश” से है.
अष्ट छाप के कवि नंददास जी भी इसी सोरों के थे जो कृष्ण भक्त कवि थे.ये तुलसीदास के चचेरे भाई बताए जाते हैं.
सोरों में “महाप्रभु वल्लभाचार्यजी की बैठक” भी है.
यहां सिक्खों के गुरु संत श्री गुरुनानक देव थी भी पधारे थे.
आज भी यहां का “गुरुद्वारा ” दर्शनीय स्थल है.
सोरों की ” पंचकोसी परिक्रमा ” लगाने के लिये दूर-दूर से
भक्तजन और परिक्रमार्थी पधारते हैं. जिसमें मथुरा, आगरा, अलीगढ़, एटा,मैनपुरी, इटावा. फरुखाबाद, बदायूं, बरेली ,मुरादाबाद और कासगंज जनपदों के साथ-साथ ,देश-भर के श्रद्धालु भक्तजन भाग लेते हुए स्वयं को सौभाग्यशाली मानते हैं.
सोरों ! सूकरक्षेत्र ! रेलमार्ग और सड़क मार्ग से सुगमता के साथ आया जा सकता है. उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ की सरकार ने
सोरों ( सूकर क्षेत्र) को तीर्थ स्थल घोषित कर इसे दिव्य और
भव्य रूप प्रदान करने का संकल्प लिया है.
चित्र सौजन्य _
शशिराज भारद्वाज, विक्रम पाण्डेय एवं मनोज पाराशर
” उपजा ” यू.पी.जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन ( लखनऊ)
कासगंज जनपद
डॉ. श्रीकृष्ण ‘शरद ‘
वरिष्ठ उद्घोषक (से.नि.)
आकाशवाणी, मथुरा -वृन्दावन.

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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