क्या संघ और भाजपा आगामी चुनाव में महिलाओं के वोटों के ध्रुवीकरण की दिशा में काम कर रहे हैं?

संघ के विजयादशमी कार्यक्रम में पहली बार किसी महिला संतोष यादव को मुख्य अतिथि बनाया गया, एक आदिवासी समाज की महिला श्रीमती द्रोपदी मुर्मू को राष्ट्रपति बनाया गया, प्रधानमंत्री लालकिले से महिलाओं के लिए अपशब्द न कहे जाने की अपील कर रहे हैं।
ये घटनाएं बता रहीं हैं कि इनका अगला टारगेट वोट महिला है। बिहार में शराबबंदी और अराजकता से मुक्ति के नाम पर नितिश भाजपा गठबंधन को महिलाओं ने थोक में वोट दिया था जिसे बाद में चुप्पा वोट कहा गया और जीत में अहम माना गया। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भी शासन की मुफ्त राशन योजना का सीधा प्रभाव घर चलाने वाली महिलाओं पर पड़ा और दोनों जगह भाजपा सरकार की वापसी हो गई। इसके लिए भी लाभार्थी महिलाओं को जिम्मेदार माना गया।
भाजपा के पास वर्तमान में नामचीन महिला नेतृत्व नहीं है उनकी महिला मोर्चा अध्यक्ष वानथी श्रीनिवासन का नाम भाजपाई ही नहीं जानते हालाकि उन्होंने सुपर स्टार कमल हासन को चुनाव में हराया था। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण में वोट बटोरने की क्षमता नहीं है और स्मृति ईरानी अंहकारवश बहुत विवादित हो गई है।
दूसरी ओर कांग्रेस, बसपा, टीएमसी में महिला नेतृत्व है और ये तीनों ही बड़ी चुनौती भी है। देश में 2014 में महिला महिला मंत्रियों की संख्या 23% थी जो अब घटकर 7% रह गई है। भाजपा, कांग्रेस की सरकार के दौरान महिला आरक्षण पर लगातार सरकार को घेरती रही थी हालांकि सरकार बनने के बाद उसने कभी इसका नाम नहीं लिया, हो सकता है अब यह जिन्न भी बोतल से निकाला जाए।
देश में भावनात्मक रूप से यदि सबसे ज्यादा प्रभावित कोई होता है तो वो महिला है। बिलकीस बानो के बलात्कारियों की रिहाई, महबूबा मुफ्ती को प्रताड़ना, ममता बनर्जी की बेइज्जती, सोनिया गांधी पर अपशब्द, भाजपा शासित राज्यों में बढ़ रहे महिला अत्याचार आदि उसे प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में उस वर्ग के वोटों के ध्रुवीकरण को एजेंडा बनाया गया है।