बिना झोले वाला सच्चा फकीर राष्ट्रपति!

बिना झोले वाला सच्चा फकीर राष्ट्रपति!

ये हैं दक्षिण अमेरिकी देश उरुग्वे के पूर्व राष्ट्रपति जोस मुजिका। इनका नाम दुनियाभर में आदरपूर्वक लिया जाता है क्योंकि इन्होंने अपने देश को तरक्की की बुलंदियों पर पहुंचा दिया लेकिन खुद के बारे में कभी सोचा ही नहीं और फकीरों जैसा मस्ती भरा जीवन बिताया।

मुजिका क्यूबा की क्रांति से प्रेरित उरुग्वे के एक वामपंथी सशस्त्र संगठन टुपामारोस गुरिल्ला के 1960 और 1970 के दशक में सदस्य रहे। जनसरोकारों के निमित्त संघर्ष करते हुए उन्हें छह बार गोली लगी और 14 साल जेल में बिताए। अंततः देश से तानाशाही खत्म हुई और लोकतंत्र की जीत हुई।

इसके बाद धीरे-धीरे मुजिका उरुग्वे की राजनीति में सक्रिय हो गए। फिर 2010 में उरुग्वे के 40वें राष्ट्रपति के रूप मेें निर्वाचित हुए। उन्होंने पांच सालों में देश को शिखर तक पहुंचाकर मार्च 2015 में राष्ट्रपति के पद से यह कहते हुए इस्तीफा दे दिया था कि उन्हें अपने तीन पैर वाले दोस्त मैनुअल और चार पैर की बीटल के साथ बिताने के लिए समय की जरूरत है। मैनुअल उनका पालतू कुत्ता और बीटल गाड़ी है।

इस कर्मयोगी ने अपने पांच साल के कार्यकाल में देश को तो अमीर बना दिया लेकिन खुद ‘फकीर’ बने रहे। इसीलिए इन्हें दुनिया का सबसे गरीब राष्ट्रपति कहा जाता है।

उन्हें जब दुनिया का सबसे गरीब राष्ट्रपति का नाम दिया गया था, तो इस बारे में उनकी उत्कृष्ट प्रतिक्रिया थी—”मुझे सबसे गरीब राष्ट्रपति कहा जाता है; लेकिन मैं खुद ऐसा नहीं सोचता। गरीब वे हैं जो केवल अपनी विलासिता के लिए काम करते हैं और अधिक चाहते हैं।”

क्या आप यकीन करेंगे कि ये अपना सारा वेतन जरूरतमंदों को दान कर दिया करते थे क्योंकि इनका मानना था कि जब हमें सरकार की तरफ से सारी सुविधाएं मिल रही हैं तो ऐसे में वेतन लेकर क्या करेंगे।

राष्ट्रपति रहते हुए जोस मुजिका को मासिक वेतन 13300 डॉलर मिलते थे, जिसमें से वे 12000 डॉलर गरीबों को दान कर देते थे। बाकी बचे 1300 डॉलर में से 775 डॉलर छोटे कारोबारियों को दे देते थे। जीवनयापन के लिए मुजिका खुद खेती करते हैं।

मुजिका जीवनपर्यंत फकीरों जैसा जीवन जीते रहे। राष्ट्रपति रहते हुए भी सरकारी आवास के बजाय अपने 2 कमरे के मकान में रहते थे और सुरक्षा के नाम पर बस दो पुलिसकर्मियों की सेवाएं लेते थे। वे अपनी पुरानी फॉक्सवैगन बीटल को खुद ड्राइव कर ऑफिस जाते थे। हालांकि, ऑफिस जाते समय वे कोट-पैंट पहनते थे, लेकिन घर पर बेहद सामान्य कपड़ों में रहते थे।

मुजिका पत्नी के साथ मिलकर फूलों की खेती करते हैं, ताकि कुछ अतिरिक्त आमदनी हो सके। अपने खेतों में ट्रैक्टर भी वे खुद ही चलाते हैं। ट्रैक्टर खराब हो जाए तो मेकैनिक बुलाने की बजाय खुद ही ठीक भी करते हैं। वे कोई नौकर-चाकर भी नहीं रखते। वे आम लोगों की तरह खुद कुएं से पानी भरते हैं, अपनी चाय स्वयं तैयार करते हैं और अपने कपड़े भी धोते हैं।

शायद आप सोचते होंगे कि उरुग्वे एक गरीब देश है, इसीलिए यहां का राष्ट्रपति भी गरीब है। जी नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है। वहां के लोगों की मासिक औसत आमदनी 50,000 रुपए है।

भारत में राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण बैंक (नाबार्ड) द्वारा हर तीसरे साल किये जाने वाले सर्वेक्षण (एनएएफआइएस) के मुताबिक वर्ष 2012-13 से 2015-16 के बीच देश के किसानों की खेती से होने वाली औसत वार्षिक आय 1,07,172 रुपए यानी 8,931 रुपए प्रति महीने थी।

काश, हमने भी ऐसे ही किसी कर्मयोगी और नैतिक-चारित्रिक रूप से समृद्ध व्यक्ति को अपना नेता चुना होता। ■

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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