आजम की अगुवाई में होगी मुस्लिम विधायकों की लामबंदी,क्या सपा का साथ छोड़ेंगे मुस्लिम

लखनऊ।उत्तर प्रदेश में जहां एक तरफ प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के मुखिया शिवपाल सिंह यादव और समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के बीच युद्ध छिड़ा हुआ है तो वहीं दूसरी ओर सीतापुर जेल बंद आजम खान अब समाजवादी पार्टी के लिए बड़ी मुश्किलें खड़ी करने जा रहे हैं। यूपी में हाल ही में सम्पन्न हुए विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के सबसे अधिक विधायक जीते थे। समाजवादी पार्टी और उसके सहयोगियों को मिलाकर 34 मुस्लिम विधायक जीतकर सदन में पहुंचे थे,लेकिन सूत्रों से खबर हैं कि मुस्लिम विधायकों में पार्टी मुखिया अखिलेश यादव के प्रति नाराजगी दिखाई दे रही है और मुस्लिम विधायक एकजुट होकर आजम की अगुवाई में नया मोर्चा बना सकते हैं।
अखिलेश से क्यों नाराज है आज़म ख़ान का ख़ेमा
उत्तर प्रदेश की राजनीति में आजम खान एक बड़ा नाम है। आजम खान इस समय सीतापुर जेल में बंद हैं।सपा मुखिया अखिलेश यादव आजम खान के समर्थकों के निशाने पर हैं।आजम खान के समर्थकों का आरोप है कि जब पार्टी का मुखिया अपने खास नेता के साथ नहीं खड़ा रह सकता तो फिर वो आम कार्यकर्ताओं के साथ कैसे खड़ा रह सकता है।बैरहाल सपा मुखिया अखिलेश यादव ने आजम खान के समर्थकों को और शिवपाल सिंह यादव को करारा जवाब देते हुए कहा कि पार्टी हमेशा आजम साहब के साथ खड़ी है।राजनीतिक पंडितों की माने तो अब सपा मुखिया अखिलेश यादव की राजनीति बदल चुकी है और वो अब 80 और 20 के समीकरण में केवल 20 फीसदी वर्ग के साथ खड़े होना नहीं दिखना चाहते जैसा कि उनके पिता मुलायम सिंह किया करते थे।
क्या मुस्लिम विधायक बनाएंगे अपना राजनीतिक दल
उत्तर प्रदेश 2022 विधानसभा चुनाव में 34 मुस्लिम विधायक चुन कर आये हैं।पिछली बार इन मुस्लिम विधायकों संख्या 24 थी। 21 विधायक पश्चिमी यूपी से, छह मध्य यूपी से और सात पूर्वांचल से जीते हैं। 34 में से 31 विधायक सपा के हैं, दो उसकी सहयोगी दल राष्ट्रीय लोकदल और एक सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के है जो सपा गठबंधन का हिस्सा है। अब सवाल ये उठ रहा है कि क्या ये 34 विधायक एकजुट होकर मुस्लिमों के हक की राजनीति कर सकते हैं,क्या इसके लिए वो आजम खान को अपना नेता मानकर चलेंगे।कहीं न कहीं ये बात उठ रही है, लेकिन मुस्लिमों का कोई भी नेता कभी मुसलमान नहीं बना है।कभी मुलायम सिंह यादव नेता बने तै कभी मायावती।ओवैसी पर भाजपा का होने का ठप्पा लगा है।कहीं ना कहीं यह बात उठ रही है कि इन्हें इकठ्ठा होकर अपनी आवाज़ बुलंद करनी चाहिए। उसकी अगुवाई कौन करेगा ये एक बड़ा सवाल है।
मुस्लिमों ने आजम को कभी नही माना नेता
राजनीतिक पंडितों की माने तो भाजपा में न तो मुसलमानों का मन मिलेगा और ना बात मिलेगी। इतनी तादाद में भाजपा की ओर मुसलमान ना जा पाएं,हो सकता है ये लोग कांग्रेस का रुख़ करें और ऐसा नहीं तो वो अपनी पार्टी भी बना सकते हैं। किसी दल में जाते हैं तो दूसरी बात है,लेकिन अगर पार्टी बनाते हैं तो वो बड़ा परिवर्तन होगा।क्या आज़म ख़ान के पक्ष में मुस्लिमों की गोलबंदी हो सकती है।आज़म ख़ान की 35-36 सालों की जो राजनीति रही है उसमें मुस्लिमों ने आजम खान को अपने नेता के रूप में नहीं स्वीकारा है।आजम खान सपा का मुस्लिम चेहरा तो थे,लेकिन मुस्लिम नेता कभी नहीं थे। आज़म ख़ान की जो उम्र है, जो उनके मुक़दमे हैं, उसकी वजह से मुस्लिम उनका नेतृत्व स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।
सपा के 34 विधायक सदन में पहुंचे
यूपी विधानसभा में अब तक 2012-2017 के कार्यकाल में सबसे ज्यादा मुस्लिम विधायक 69 रहे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक इनमें से 45 विधायक उस वक्त समाजवादी पार्टी के थे। 1991 में राज्य विधानसभा ने कथित तौर पर सबसे कम आंकड़ा देखा जब केवल 17 मुस्लिम विधायक चुने गए थे। रिपोर्टों के अनुसार, 2022 के राज्य चुनावों में मायावती के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी ने 88 मुस्लिम नेताओं को टिकट दिया था, जबकि समाजवादी पार्टी ने 64 मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था। सांसद असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन ने 60 से अधिक सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार खड़े किए थे।