मां तो अनमोल है:मां को मोक्ष दिलाने सात समंदर पार से कानपुर पहुंचा बेटा,कोरोना काल में हुई थी मां की मौत

कानपुर।कोरोना काल ये एक ऐसा शब्द है,जो शायद ही कोई याद रखना चाहेगा।आज भी इस शब्द से लोग सिहर उठते हैं।कोरोना काल में ऐसा भी समय आया था कि किसी की मौत पर उसके परिवार के सदस्य तक शामिल नही हो पाए।अंतिम संस्कार में भी परिवार के लोग नहीं पहुंच पाए।कोरोना काल में मानवता को झकझोर देने वाले कई मामले सामने आए थे जहां चंद लोगों ने मानवता को तोपों से उड़ाया।कानपुर के भैरव घाट पर युग दधीचि देहदान संस्थान ऐसे ही दिवंगत हो चुके लोगों की अस्थियां संभाल कर रखे हुए है।
आपको बता दें की सनातन धर्म की परंपरा रही है कि मरने के बाद मोक्ष तभी मिलता है, जब अस्थियों का गंगा जी में विसर्जन किया जाए।सनातन धर्म की इस परंपरा को विदेश में रहने वाले प्रवासी आज तक नहीं भूले है। इंग्लैंड में रहने वाले दीपांकर दीक्षित कानपुर पहुंचे। भैरोघाट के मोक्षधाम में अस्थि कलश बैंक से अपनी मां की अस्थियों का पूरे विधि विधान से पूजन करने के बाद प्रयागराज के लिए रवाना हो गए।
कानपुर के आर्यनगर में रहने वाली 65 वर्षीय कल्पना दीक्षित की मौत दो साल पहले कोरोना काल में ही गयी थी। मां की मौत की जानकारी मिलने पर दीपांकर ने भारत आने के लिए बहुत कोशिश की,लेकिन कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए लागू हुए लॉकडाउन की वजह से दीपांकर भारत नहीं आ सके। दीपांकर की मां कल्पना के शव का अंतिम संस्कार उनके भतीजे आनंद त्रिपाठी ने किया था।दीपांकर ने अपने ससुर जगतवीर सिंह द्रोण से आग्रह कर मां की अस्थियां सुरक्षित रखने के लिए कहा। अंतिम संस्कार के बाद दीपांकर के मां की अस्थियां भैरोघाट पर बने अस्थि कलश बैंक में सुरक्षित रख दी गई थी।
अस्थि बैंक के संस्थापक ने बताया कि ये अस्थि कलश कल्पना जी का था।उनके बेटे नहीं आये थे तो भतीजे ने अंतिम संस्कार किया था।दो साल बाद उनके बेटे आए हैं और पूजन विधि के बाद अस्थि कलश प्रयागराज ले जा रहे हैं, जहां उनका विसर्जन किया जायेगा।
दीपांकर और और उनकी पत्नी जया ने कल्पना की अस्थियों का पूजन करने के बाद प्रयागराज के लिए रवाना हुए। दीपांकर मां की अस्थियों को संगम में विसर्जित करेंगे। दीपांकर की पत्नी जया ने बताया कि कोरोना के समय लॉकडाउन लगा हुआ था, जिसके कारण हम लोग भारत नहीं आ सके थे।अब दो साल बाद भारत आ सके है।