अपराधियों और गैंगस्टरों से भरे उत्तर प्रदेश की छवि

यूपी की पहचान की बात करें तो 1990 के दशक में राज्य की ग़रीबी ने बहुत ध्यान खींचा था लेकिन इन दिनों अपराध पर केंद्रित वेब सिरीज़ राज्य को अलग पहचान दे रहे हैं। ये वेब सिरीज़ माफ़िया, अपराध और सीरियल किलर पर केंद्रित हैं, जिन्हें कि यूपी में दर्शाया जा रहा है।
मिर्ज़ापुर, रक्तांचल, बीहड़ का बाग़ी, भौकाल, असुर और रंगबाज़ जैसे सिरीज़ एक तरह से राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों की तस्वीर पेश करते हैं, जिनसे पता चलता है कि महिलाओं और बच्चों के ख़िलाफ़ राज्य में अपराध दर (मध्य प्रदेश के साथ) भारत में सबसे अधिक है। राष्ट्रीय महिला आयोग के अनुसार महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध की सबसे अधिक शिकायतें यूपी (और दिल्ली) से थीं।
ऐतिहासिक तौर पर देखें तो उत्तर प्रदेश हिंदी पट्टी के बिहार और ओड़िशा जैसे राज्यों से अलग नज़र आता है। बिहार और ओड़िशा अंग्रेजों के ज़माने में बंगाल प्रांत का हिस्सा थे जबकि यूपी 1836 में स्थापित उत्तरी पश्चिमी प्रांत का हिस्सा था। यह कई प्रांतों का विलय करके स्थापित किया गया क्षेत्र था।
आज़ादी की पहली लड़ाई 1857 में लड़ी गई। उसके बाद 1858 में नवाबों के शहर अवध को भी उत्तर पश्चिम प्रांत में मिला दिया गया।
1902 में आगरा और अवध प्रांतों के साथ इसका पुनर्गठन किया गया था और 1921 में इसे आगरा और अवध का संयुक्त प्रांत (यूनाइटेड प्रॉविंस) कहा जाने लगा, लखनऊ को राज्य की राजधानी बनाया गया।
1931 में इसका नाम संयुक्त प्रांत किया गया। 1985 में भारतीय जन सर्वेक्षण के मानव विज्ञान सर्वेक्षण के मुताबिक राज्य में 308 समुदाय रहते हैं। यह भारत के किसी राज्य में समुदायों की दूसरी सबसे बड़ी संख्या है।
प्रदेश में कुल मिलाकर 37 भाषाएं बोली जाती हैं, लेकिन राज्य की पहचान हिंदी है। पत्रकार और लेखिका मृणाल पांडे के अनुसार, “यूपी की पहचान जटिल है। सलाद का कटोरा समझ सकते हैं जिसमें कई तरह की परतें और कई तरह की पहचान एक साथ अस्तित्व में हैं। रूढ़िवाद और सामंतवाद तो था, लेकिन कट्टरता नहीं थी, यह नई पहचान है जिसमें कट्टरता है। इस कट्टरता से समाज का ताना-बाना असहज तौर पर टूटा है।”
अपने शोध अध्ययन के दौरान मृणाल पाण्डे ने पाया कि 1920 से ही, “हिंदू परिवारों में, भारतीयता और हिंदू धर्म के बारे में बहुत मंथन और भ्रम था। राजनीतिक दलों ने इसका लाभ उठाया और उन्होंने हिंदुत्व को लेकर फैले भ्रम को दूर करके एक निश्चित परिभाषा देने की मुहिम पर काम शुरू किया।”
उत्तर प्रदेश राज्य को हिंदी गहरे रूप में जोड़ती है। प्रदेश में महत्वपूर्ण बौद्ध केंद्र मौजूद हैं। इसमें संकिसा, कुशीनगर और सारनाथ जैसी जगहें हैं जो बुद्ध से सीधे जुड़ी हुई हैं। मुसलमानों के लिए, देवबंद विश्व स्तर का महत्वपूर्ण मदरसा है और बरेलवी समुदाय के कई केंद्र मौजूद हैं। इन सबके साथ हिंदूओं के सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ राम और कृष्ण की जन्मभूमि (अयोध्या और मथुरा) तो हैं ही, धार्मिक आस्था केंद्र वाराणसी भी इसी राज्य में है।
यही वजह है कि बीजेपी के गठन से पहले ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जनसंघ ने हिंदू राष्ट्रवाद की परियोजना के साथ इस राज्य पर ध्यान केंद्रित किया था। 1990 के दशक के बाद से धार्मिक आधार पर विभाजन तेजी से बढ़े।
गोविंद बल्लभ पंत के नेतृत्व में प्रमुख यूपी कांग्रेस का रंग पूरी तरह से हिंदूवादी था। देश के विभाजन के बाद बंगाल और पंजाब से मुसलमानों के एक बड़े वर्ग के पाकिस्तान जाने के फ़ैसले को धार्मिक विभाजन की लंबी छाया से जोड़कर देखा जा सकता है।
धार्मिक विभाजन की यह रेखा समय-समय पर दंगों के तौर पर उभर आती है, जिसमें जान-माल दोनों को नुकसान होता है। प्रदेश के अंदर 1980 के दशक में मेरठ और मुरादाबाद में यह दिख चुका है और 2013 में मुजफ़्फ़रनगर में भी यह देखने को मिला। इससे राज्य की पहचान पर असर होता है।
गंगा-जमुनी तहजीब
उत्तर प्रदेश की पहचान यहाँ की गंगा-जमुनी तहजीब रही है। मतलब ठीक उसी तरह से हिंदू-मुस्लिम संस्कृति का मिलन रहा है जैसे प्रयागराज में गंगा यमुना नदी का संगम होता है। यह एक तरह से अनूठी और साझी संस्कृति की निशानी है।
फ़िल्मों का हमारे समाज की लोकप्रिय संस्कृति पर गहरा असर रहा है। जबसे हिंदी सिनेमा की शुरुआत हुई तब से ही गीतकार, पटकथा लेखक और कंटेंट को तय करने वाले लोग उत्तर प्रदेश के थे। सिनेमा में जितने भी बदलाव दिखे, वे यहां हो रहे बदलावों के अक्स थे। जब यहाँ प्रगतिशील लेखक फले-फूले तो इसका असर हिंदी सिनेमा पर भी दिखा। इसके चलते ही गंगा-जमुनी संस्कृति का प्रचार-प्रसार हुआ. जो कस्बों और गांवों में फैली भी। हिंदुस्तानी भाषा का चलन भी बढ़ा और ये आज भी है।
राही मासूम रज़ा, कमाल अमरोही, ख्वाज़ा अहमद अब्बास, मज़रुह सुल्तानपुरी, शकील बदायूँनी, कैफ़ी आज़मी जैसे अनगिनत नाम हैं, जिनका गहरा संबंध उत्तर प्रदेश और हिंदी सिनेमा से रहा है।
उत्तर प्रदेश को आम तौर पर पश्चिम बंगाल या तमिलनाडु या फिर किसी और अन्य क्षेत्रीय फ्लेवर वाले राज्यों में शुमार नहीं किया जाता। यूपी का प्रभुत्व कई दशकों से देश भर में रहा है, इसकी एक वजह तो राजनीतिक प्रभुत्व है और दूसरी वजह यह है कि सिनेमा, संगीत और साहित्य के ज़रिए यूपी की संस्कृति का भी काफ़ी प्रचार-प्रसार हुआ है। एक तरह से कहें तो भारत की अवधारणा पर उत्तर प्रदेश की मुहर लगी हुई है।
लेकिन प्रदेश की संस्कृति की पहचान अब महज गंगा-जमुनी तहजीब तक नहीं रही।
राज्य में मौजूदा समय में विचारों की लड़ाई लड़ी जा रही है। कह सकते हैं कि तलवारें तन चुकी हैं और हिंदू राष्ट्रवाद के समर्थक पूरी ज़ोर-आजमाइश कर रहे हैं ताकि धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र को हिंदू राष्ट्र में बदला जा सके।
हिंदू, मुसलमानों के आपसी मेल की गंगा-जमुनी संस्कृति अब अतीत की बात लग रही है। बीते सितंबर महीने में विश्व हिंदू परिषद के मिलिंद परांजपे ने मथुरा में एक प्रेस कांफ्रेंस में स्पष्ट तौर पर कहा था कि “हिंदू पहचान सर्वोच्च होनी चाहिए।”
साफ़ है कि राज्य में अब गंगा-जमुनी तहजीब के आलोचक कहीं ज़्यादा मुखर और मज़बूत हो रहे हैं।
संदीप बालकृष्ण को ट्विटर पर पीएम मोदी भी फॉलो करते हैं। संदीप धर्म डिस्पैच नाम का एक पोर्टल चलाते हैं, वे लिखते हैं, “हिंदुओं को रज़िया की तरह ऐतिहासिक अज्ञानता के लौकिक पर्दे से पार होना होगा और गंगा-जमुनी तहजीब को वास्तव में क्या है, इसे समझने की ज़रूरत है। अगर आप शिकारी की तहज़ीब में विश्वास करते हैं, जिससे अपने शिकार पर कुछ वक़्त के लिए हमला रोक दिया है, अगर आप मानते हैं कि भेड़ियों और भेड़ों का झुंड सौहार्द की एक ही झील से पानी पी सकता है, तो वही गंगा-जमुनी तहज़ीब है।”
मंडल, मंदिर और बाज़ार
अशोका यूनिवर्सिटी की राजनीतिक समाजशास्त्री प्रोफ़ेसर जूलियन लेवेस्क के मुताबिक भारतीय जनता पार्टी पूरे देश की पहचान को भारत के सबसे बड़े राज्य की पहचान से जोड़कर रखना चाहती है। लेवेस्क के मुताबिक यह काशी कॉरिडोर के प्रधानमंत्री मोदी के उद्घाटन से ज़ाहिर है।
लेवेस्क का कहना है, “जय श्रीराम का नारा भारत में हिंदुत्व को बढ़ावा दे रहा है और भारत में जो इस्लामी संस्कृति है, उसकी उपेक्षा दिख रही है। यह काम चल रहा है। इसे आप जगहों के नाम बदले जाने से लेकर उत्तर प्रदेश की पर्यटन पुस्तिका से ताज महल को हटाए जाने तक में देख सकते हैं।”
1990 के दशक में शुरू हुए आर्थिक उदारीकरण का भी यूपी की राजनीति और समाज पर गहरा असर हुआ। प्रदेश के लगभग हर ज़िले में एक अलग शिल्प कारीगरी की परंपरा रही है, जैसे भदोही में कालीन, फ़िरोजाबाद में कांच का काम, लखनऊ में चिकनकारी, मुरादाबाद में पीतल, अलीगढ़ में ताला और रामपुर में चाकू वग़ैरह, लेकिन जब पूरे भारत में आर्थिक सुधार लागू हुए तो उत्तर प्रदेश के परंपरागत शिल्प और कारीगरी को फ़ायदा नहीं मिला। यूपी इस मामले में दक्षिण और पश्चिमी राज्यों से पिछड़ गया।
क्रेग जेफ्री ने ‘डिवेलपमेंट फेल्योर एंड आइडेंटेटी पॉलिटिक्स इन उत्तर प्रदेश’ में लिखा है, “1990 के दशक में यूपी का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) केवल 1.3 प्रतिशत बढ़ा, जो राष्ट्रीय औसत के एक तिहाई से भी कम था। 2000 के दशक में स्थिति बेहतर ज़रूर हुई लेकिन आर्थिक विकास दिल्ली की सीमा से सटे कुछ ही ज़िलों में ज़्यादा दिखा। विकास के आकंड़ों में निराशाजनक प्रदर्शन की एक वजह प्रदेश के अंदर सामाजिक विभाजन की मौजूदगी भी रही है।”
जेफ्री ने लिखा है, “प्रदेश में सवर्ण हिंदुओं की आबादी लगभग 20 प्रतिशत है। समाज के दूसरे वर्गों की तुलना में यही लोग पैसे वाले या बेहतर नौकरियों में अधिक हैं, वे समाज पर काफ़ी असर रखते हैं। हिंदुओं में ‘मध्यम जातियां’ भी हैं, जो राज्य के कुछ ग्रामीण हिस्सों में सत्ता तक पहुंच को नियंत्रित करते हैं, मिसाल के तौर पर यादव या जाट। राज्य की बाक़ी आबादी में मुख्य रूप से मुस्लिमो, दलित और ग़रीब ओबीसी तबका शामिल है, जो उच्च जाति के लोगों की तुलना में ग़रीब और कम शिक्षित हैं और सत्ता के केंद्रों तक उनकी पहुँच नहीं है।”