
#कौनमररहाहै,
एक तरफ शक्ति का प्रदर्शन है तो दूसरी तरफ अकड़ का—–
दो देशों की लडा़ई हो या देश की,
सुरक्षित रहते है लडा़ने बाले दोनों, लेकिन मरते तो सैनिक और निर्दोष पब्लिक है, लड़ाने बालों के परिवार और खुद अंत तक सुरक्षित रहते है अब देखो ना रूस,और यूक्रेन, की लडा़ई एक झुकने को राजी नही दूसरा रूकने को पर लासों के ढेर उस मानवता के है जो उस धरती पर रहने की कीमत जान देकर अदा कर रहे है,और सैनिक अपने वतन, और पेट परिवार के लिये युद्ध भूमि मे शहीद हो रहे है, सबकुछ यहीं रह जाता है मानव के शिवाय हमतो हर चीज के लिये यही कहेंगे कि यह जमीन यह पैसा सब किसी काम का नहीं रह जाता है मनुष्य के शिवाय मानवता का पतझड़ भी एसा हुआ कि असर घर,समाज, रिश्ते, और वतन, पर साफ दिखाई दे रहा है हमे यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि लक्ष्मी का कोई रिश्तेदार नहीं होता है हमने इसकी भी दुर्दशा होते देखी है सहेजता और कमाता इसे खून पशीना से कोई और है इसे जान से ज्यादा संभालकर रखता कोईऔर है,पर भोगता इसे कामचोर, निठल्ले, निर्मोही की तरह है,तनमन से पूजने बालों के साथ यह भी नहीं होती है हाँ आज यह सिद्ध हो रहा हैकि माया महा ठगनी है आदमी के लक्ष्य भ्रमित करती है आज हम इसकी पूजा मे न जाने क्या क्या दावपर लगा रहे है हम अनभिज्ञ है उस परिणाम से कि यह ऊंचाई की सीढियां बनाकर इतना ऊपर ले जाती है जहाँ से मानवता की आँखें इसे कभी नहीं देख पाती है और पटकती भी उसी ऊँचाई से है रात और दिनमे कि नीचे कोई थामने बाला भी नहीं बचता है,इसकी रौशनी मे चौंधियाया हुआ इंसान कभी इंसान को नहीं देख पाता है,इस लिये हमे यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि दौलत हो या अन्य चीजें सब इंसान के लिये ही बनी है इन सबकी छतिपूर्ति हो जाती है पर मानव छति कभी नहीं तब यही कहना चाहूंगी कि एसी कोई समस्या नहीं है जिसका हल बातों और कानून से नहीं हो सकता है यह नरसंहार तो सिर्फ का शक्तिप्रदर्शन और हथियार है और कुछ नहीं जहाँ निर्दोष पब्लिक और मासूमियत मरने लगे वहाँ सिर्फ भोगियों की बस्तियाँ तो हो सकती है योगिनी और मानवता का समाज कभी नहीं जिस दौलत के लिये हम मानवता को बेच देते है कभी-कभी उस दौलत से हमे अंतिम बार का वस्त्र कफन भी नशीव नहीं होता है,भूलने की बात नहीं हैकि कफन मे जेब नहीं होती है।
लेखिका, पत्रकार, दीप्ति चौहान।