प्राईवेट स्कूलों को अभिभावकों के द्वारा फीस न देने के नारे के लिए मेरा जबाब – सोच बदलें लेकिन इरादा नहीं – राजीव दास

प्राईवेट स्कूलों को अभिभावकों के द्वारा फीस न देने के नारे के लिए मेरा जबाब – सोच बदलें लेकिन इरादा नहीं —— राजीव दास

एटा ! कोविड-19 के बचाव हेतु भारत सरकार द्वारा लागू किऐ गए लॉक डाउन के चलते अभिभावकों ने एक नारा दिया है- नो स्कूल नो फीस , इसके प्रतिउत्तर में जिले के प्रमुख शिक्षाविद एवं सेन्ट पॉल्स स्कूल के चेयर पर्सन राजीव दास ने समस्त प्राइवेट स्कूलों के प्रबंधन की हालिया समस्याओं को दृष्टिगत रखते हुए एक अलग अन्दाज में अपने लफ्जों में बयां करते हुए कहा कि सोच बदलें लेकिन इरादा नही! राजीव दास जिन्होंने मीडिया की नजरों व सुर्खियों से दूर रहकर कोविड-19 के कारण लॉक डाउन के चलते बेरोजगार हुए सर्वहारा वर्ग के न जाने कितने यतीमों के घरों के चूल्हे को चिन्गारी देकर उनके परिवार को दो जून की रोटी का प्रबंध किया जिनको बार बार सैल्यूट करने में हमें कोई अतिशयोक्ति नही होगी , जिले की इस महत्वपूर्ण शख्शियत ने स्कूल प्रबंधन का दर्द साझा करते हुए कहा कि आपने ख्याल किया होगा, जब गाय दूध नहीं दे रही होती, तब भी उसको चारा डाला जाता है ताकि गाय जीवित रहे ,वह आने वाले समय म़े फिर दूध देगी।क्योंकि जो पूज्य होते हैं उनका ध्यान रखा जाता है,अपना स्वार्थ नही देखा जाता,अब सबके सामने जिंदा रहने का सवाल है। स्कूल प्रबंधन का अर्थ सिर्फ स्कूल मालिक नहीं है। हर स्कूल में टीचर, ड्राइवर, चपरासी, अकाउंटेंट, कम्प्यूटर ऑपरेटर मिलाकर 20 से 100 का स्टाफ हो जाता है। राज्य में कई हजार निजी स्कूल हैं, जिनमें करीब 400000 लोगों को रोजगार मिला हुआ है। सभी परिवारों को 2 माह से वेतन भी दिया जा रहा है क्योंकि वह स्कूलों की ज़िम्मेदारी है,अब यदि यह उनकी ज़िम्मेदारी है तो क्या आपका दायित्व यह नही बनता की आप जो लोग आपके बच्चो को शिक्षा देते हैं उनका ध्यान आप भी रखें, यदि फीस जमा नही होगी तो स्कूल खर्चे कहां से निकलेगा, हर स्कूल औसतन 2 से 10 लाख रुपये वेतन पर खर्च करता है। ज्यादातर स्कूलों में बसें लोन पर हैं। लेकिन किश्तों में कोई माफी नहीं है। बिजली बिल माफ नहीं हैं। और कई टैक्स, जो पूरे साल के हिसाब से लगते हैं। ऐसे में उनकी परेशानी को अनदेखा नहीं किया जा सकता। दूसरी बात, लॉक डाउन में ऐसा कोई वर्ग नहीं है, जो मुफ्त सेवा दे रहा हो। क्या डॉक्टर मुफ्त दवाई दे रहे हैं? क्या मिस्त्री मुफ्त में काम कर रहे हैं?क्या सरकारी कर्मचारी तनख्वाह नहीं ले रहे? क्या बैंकों ने ब्याज या लोन माफ किया? क्या जमींदारों ने अपनी फसल गरीबों को बांट दी? कोई दुकानदार 51 रुपये का रिचार्ज 50 में भी करने को तैयार नहीं है। मेडिकल, मोबाइल, किराना, फर्नीचर, दर्जी, गारमेंट्स कहीं कुछ मुफ्त नहीं है। कुछ भी सस्ता नहीं है। सरकार ने मास्क तक मुफ्त नहीं दिए। फिर, हम स्कूलों की फीस क्यों नहीं देना चाहते। निजी स्कूलों में बड़े जमींदार, जज, डॉक्टर, वकील, सरकारी कर्मचारी, आढ़ती, बिजनेसमैन, बैंक मैनेजर भी तो अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं। वो लॉक डाउन का हवाला क्यों दे रहे हैं। सरकार ने एक अच्छी बात कही है कि जो लोग फीस देने में समर्थ हैं, उन्हें देनी भी चाहिए और यदि पूरी न दे सकें तो कुछ तो दें,स्कूल दबाव नही बनाएंगे ,और वो बना भी नही रहे है ,परन्तु फीस माफ का क्या अर्थ है?? हम डबल सोचते हैं। बच्चों को सरकारी स्कूल में भेजा तो इज्जत घट जाएगी। पढ़ाना प्राइवेट में है, लेकिन कोई फीस ना मांगें। यह विवाद सिर्फ स्कूलों के साथ नहीं है। बल्कि मुफ्तखोरी राष्ट्रीय समस्या है। हम ट्रेनों और बसों में टिकट नहीं लेना चाहते। कहीं सर्कस लग जाये तो दोस्त ढूंढते हैं, जो पास दिलवा दे। लाखों अमीरों ने फर्जी राशन कार्ड बना रखे हैं। जियो की मुफ्त सिम के लिए लोग हफ्ताभर लाइन में लगे रहे। 4G सिम चलाने के लिए 3G हैंडसेट कबाड़ में बेचने को राजी हो गए। मोबाइल डेटा बेशक रोज महंगा हो जाए, लेकिन टिक टॉक चलेगा। परन्तु हम एजुकेशन को फालतू का खर्चा मानते हैं। इसलिए देश शिक्षा में आगे नहीं बढ़ पाया। राजीव दास ने आगे कहा कि मेरी अंतरात्मा कहती है कि टीचर हमारे बच्चों के लिए सालों से मेहनत करते आए हैं। उनका मेहनताना जरूर देना चाहिये।गुरु दक्षिणा तो भगवान के समय से चलती आ रही है। चाहे थोड़ा थोड़ा करके दें। इस मुश्किल हालात में देश के इस सबसे महत्वपूर्ण अंग को अनदेखा ना करें, इसके बिना सब व्यर्थ है।ध्यान रखिये स्कूल वो स्थान है जहां से बच्चा विद्वान बन कर निकलता है , इसलिए जो लोग आपके बच्चे का भविष्य बनाने वाले हैं, उनका सम्मान करो,उनका समर्थन करो…विरोध नहीं।

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