एटा मेडिकल कालेज में करोड़ों की खरीद फरोख्त के
नाम पर बहती गंगा में खूब हाथ धोये..!
- फर्नीचर एवं उपचार के मशीनी उपकरण आदि के नाम पर परचेजिंग में खेल
*अनेकों पैथोलॉजी एक्सपर्ट होने के बावजूद
बेस हॉस्पिटल्स की लैब में 2 एलटी के सहारे
क्यों ?
*ब्लड सैपरेशन यूनिट के लिये मेडिकल कालेज अथॉरिटी उपलब्ध नही करा सकी

एटा। जिले की विकास यात्रा में ‘मील का पत्थर’ कहा जाने बाला मेडिकल कालेज इन दिनों अपनी भृष्ट गतिविधियों के कारण दिनों दिन सुर्खियों में आता जा रहा है । लगता है मेडिकल कालेज प्रशासन की आला अथॉरिटी इसे खाने कमाने का निजी संपत्ति समझ बैठी है। इसी लिये जन स्वास्थ्य के ज्वलन्त मुद्दों का कतई ध्यान नही उल्टे सुविज्ञ चिकित्सकीय पॉवर का स्तेमाल भृष्ट सिस्टम को संचालित करने के लिये किया जा रहा। सूत्रों के मुताबिक बताया गया है अनेक मौसमी संक्रमण से जनित बीमारियों की रोकथाम एवं मुकम्मल जांच आदि के लिये मेडिकल कालेज में वायो केमिस्ट्री, पैथोलॉजी, माइक्रो वायोलॉजी में विशेष दक्षता रखने बाले अनेक वरिष्ठ चिकित्सक सीनियर रेजिडेंट, प्रोफेसर , असि0 प्रोफेसर के रूप में रखे गए है जिन पर लाखों का वेतन खर्च किया जा रहा है। विस्मय की बात है इस क्षेत्र के एक्सपर्ट डॉक्टरों का उपयोग कोविड एवं डेंगू जैसी महामारी के दौर में नही किया गया जबकि पैथोलॉजी को इनके योगदान से और अधिक प्रभावी एवं गतिशील किया जा सकता था। उधर मेडिकल कालेज के बेस हॉस्पिटल्स की पैथोलॉजी सिर्फ दो एलटी के सहारे इस बुरे दौर में हाँफती रही बीमारों को प्राइवेट पैथोलॉजी की तरफ रुख करना पड़ा। उधर कालेज की अथारटी कृपा पात्र वरिष्ठ एक्सपर्ट मेडिकल कालेज के प्रशासनिक भवन में खाने कमाने के खेल में लगाये रखे गए। अच्छा होता इनकी योग्यता उपयोग एटा की हाँफते पैथॉलोजी सिस्टम को सही करने के लिये किया जाता।
बताते हैं अब तक मेडिकल कालेज को सज्जित करने उपकरणों से लैस करने में बम्पर परचेंजिग हुई है एसएन हॉस्पिटल के प्रिसिपल की अगुआई में पहले ही नियमो को धता देते हुये 2 करोड़ से अधिक की परचेजिंग हो चुकी थी जिस पर काफी बवाल स्थानीय स्तर पर मचता रहा। अब नई अथॉरिटी की अगुआई में सूत्रों ने बताया लगभग 2 करोड़ की परचेजिंग हुई जिनमे फर्नीचर आदि पर लगभग 80 लाख का बजट उपयोग किया गया है। उपचार की मशीनें एवं आवश्यक उपचार उपकरणों पर भी लगभग 80 लाख रुपये का बजट उपयोग की खबरें है।हैरत की बात यह इस बम्पर परचेजिंग में आई सामग्री के रख रखाव एवं उनकी गुणवत्ता देखने के लिये कोई इंतजाम नही है सिर्फ दो फार्मासिस्ट के सहारे करोड़ो के समान को सुपुर्द कर दिया गया है स्मरण रहे मेडिकल कालेज के स्टोर आदि के लिये जिला/महिला अस्पताल के फार्मासिस्टों से काम लिया जा रहा है जिससे काम के दबाव में फार्मासिस्ट संवर्ग में रोष व्याप्त है। बताया जाता है किसी भी क्रय गतिविधि के लिये पूर्व निर्धारित क्रय समिति का 7 दिन पहले एजेंडा दिया जाता है बैठक करके सहमति से क्रय कार्यवाही आगे बढ़ती है परन्तु अधिकांश परचेजिंग नियमो को धता देकर मिली भगत से की गई है। मेडिकल कालेज के जानकारों को यह तक पता नही गुणवत्ता परीक्षण कमेटी कौन सी है और उसने गुणवत्ता की जांच कर ली या नही। लुका छुपी से जिस तरह परचेजिंग प्रक्रिया की धज्जियां उड़ाई है वह सब बड़ी के।बहुत बड़ी कमीशनखोरी की चुगली करती हैं।
जन स्वास्थ्य की दृष्टि से स्वास्थ्य चिकित्सा सिस्टम को मजबूत करने एव उसको प्रभावी गतिशील करने की दिशा में मेडिकल कालेज प्रशासन कोसो दूर है। कालेज के इस मिजाज को सिर्फ एक उदाहरण से समझा जा सकता है यूपी गवर्नमेंट ने डेंगू महामारी प्रकोप को देखते हुये ब्लड सैपरेशन यूनिट की स्थापना हेतु स्थान चयन के लिये निर्देशित किया जिस पर सीएमओ डॉ उमेश त्रिपाठी ने रुचि दिखाई परन्तु मेडिकल कालेज प्रशासन जगह नही दिला सका और नजरंदाज कर दिया।
कुल मिला कर एटा का मेडिकल कालेज खाने कमाने बाले सिंडिकेट का चरागाह बन कर रह गया है यदि समय रहते मीडिया, जनप्रतिनिधि एवं जागरूक जनता नही चेती करोड़ो के बजट से बन कर तैयार हुआ यह महल सिर्फ सफेद हाथी के रूप में खड़ा दिखेगा। देखना है केंद्र प्रदेश की सरकारें कालेज में चल रही अनियमितताओं को किस रूप में लेती है??