खुली अदालत में सुनवाई के अनुरोध पर विचार किया जाएगा

खुली अदालत में सुनवाई को फिर से शुरू करने के अनुरोधों का जायजा लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अधिवक्ताओं और पक्षकारों को अपनी लिखित रूप से संयुक्त सहमति देने के लिए कहा है। ऐसी सहमति मिलने पर ही खुली अदालत में सुनवाई के अनुरोध पर विचार किया जाएगा। अतिरिक्त रजिस्ट्रार के दस्तखत वाला सर्कुलर मंगलवार को जारी किया गया, जिसमें कहा गया है कि, “प्राप्त विभिन्न अनुरोध के मद्देनज़र खुली अदालत में अधिवक्ताओं की भौतिक उपस्थिति की व्यवहार्यता का पता लगाने के लिए, सामाजिक दूरियों के मानदंडों का पालन करते हुए, यह सभी अधिवक्ताओं और पक्षकारों को सूचित किया गया है कि खुली अदालत में उपस्थित होने और बहस करने के लिए संयुक्त सहमति देनी होगी। सभी पक्षों की सहमति प्राप्त होने पर ही मामले को माननीय न्यायालय के समक्ष सूचीबद्ध करने पर विचार किया जाएगा, जो कि पीठ की उपलब्धता के अधीन होगा। ” Also Read – भीमा कोरेगांवः सुप्रीम कोर्ट ने दिल्‍ली हाईकोर्ट में जारी गौतम नवलखा की जमानत की कार्यवाही पर रोक लगाई सर्कुलर ने आगे स्पष्ट किया है कि खुली अदालत की सुनवाई शुरू करने का आदेश केवल सक्षम प्राधिकारी के आदेश और अपेक्षित सामाजिक दूरी के मानदंडों के अधीन होगा। सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन (SCAORA) ने आज मुख्य न्यायाधीश एस ए बोबडे को एक पत्र लिखकर आग्रह किया था कि जुलाई, 2020 से अदालत में भौतिक रूप से खुली सुनवाई के काम को बहाल किया जाए। पत्र में कहा गया कि ओपन कोर्ट की सुनवाई भारतीय कानूनी प्रणाली की “रीढ़” है और वर्चुअल कोर्ट भौतिक पीठों का विकल्प नहीं हैं। Also Read – ऐसा कोई कानून नहीं है कि मुख्य अपराधी के साथ कोई व्यक्ति हर कृत्य के संबंध में अपना इरादा साझा करता है जिसके तहत उसने अपराध किया है: सुप्रीम कोर्ट इसमें वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से ऑनलाइन फाइलिंग और मामलों की सुनवाई में “व्यावहारिक कठिनाइयों” की ओर ध्यान आकर्षित किया गया है। यह कहा गया है कि वकीलों / वादियों को अक्सर एक वर्चुअल सेटिंग में अपने मामले का प्रभावी ढंग से उल्लेख करने के लिए विवश किया जाता है, जबकि तकनीकी कमी, अपर्याप्त सरंचना उपलब्धता, वित्तीय बाधाओं आदि जैसे कारक इसे मुश्किल बनाते हैं। इस प्रकार, SCAORA अध्यक्ष, शिवाजी एम जाधव ने, हजारों वकीलों की ओर से गर्मियों की छुट्टियों के बाद जुलाई 2020 में अदालत को फिर से खोलने और खुली अदालत में सुनवाई फिर से शुरू करने के लिए सीजेआई से आग्रह किया। इस साल की शुरुआत में, 28 अप्रैल को, बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने सीजेआई से ई-फाइलिंग और वर्चुअल सुनवाई की प्रणाली को लॉकडाउन के बाद को जारी नहीं रखने का अनुरोध किया था। काउंसिल ने कहा था कि अक्सर उम्र के अंतर के अनुसार व्यक्तियों के तकनीकी ज्ञान में अंतर होता है, और अक्सर शिक्षा के तौर तरीके और संसाधनों व प्रौद्योगिकी में अंतर होता है। सर्कुलर पढ़ें TAGSCOURT HEARINGS #SUPREME COURT Next Story ताजा खबरें भीमा कोरेगांवः सुप्रीम कोर्ट ने दिल्‍ली हाईकोर्ट में जारी गौतम नवलखा की जमानत की कार्यवाही पर रोक लगाई LiveLaw News Network2 Jun 2020 7:08 PM सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष जारी गौतम नवलखा की जमानत की कार्यवाही पर रोक लगा दी। सुप्रीम कोर्ट, दिल्ली हाईकोर्ट के 27 मई के आदेश के खिलाफ राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) द्वारा दायर अपील पर सुनवाई कर रहा था। दिल्‍ली हाईकोर्ट ने अपने आदेश में एजेंसी को एनआईए के विशेष न्यायाधीशों के समक्ष कार्यवाही का पूरा रिकॉर्ड प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था, जिसके आधार पर उन्हें मुंबई स्थानांतरित किया गया था। जस्टिस अरुण मिश्रा, अब्दुल नजीर और इंदिरा बनर्जी की बेंच ने नवलखा को भी नोटिस जारी किया है और उनका जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 15 जून को होगी। मामले में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने एजंसी की ओर से पेश हुए थे और कहा कि दिल्ली हाई कोर्ट का आदेश पूर्णतया गैरकानूनी है और अधिकार क्षेत्र के बाहर है। एनआईए ने अपनी अपील में कहा था, “स‌िंगल जज ने, उक्त अंतरिम आदेश में, गलती से एक ऐसे अभियुक्त की अंतरिम जमानत याचिका पर सुनवाई जारी रखी, जिन्हें माननीय हाईकोर्ट के प्रादेशिक क्षेत्राधिकार के बाहर के एक प्राधिकारी द्वारा आरोपित किया गया था और जिन्हें वर्तमान में विशेष न्यायाधीश, एनआईए, मुंबई (माननीय दिल्ली उच्‍च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र के बाहर) द्वारा पारित वैध न्यायिक रिमांड आदेश के तहत न्यायिक हिरासत में रखा गया है।” एनआईए की दलील थी कि नवलखा ने संयोग से 14 अप्रैल 2020 को दिल्ली में आत्मसमर्पण किया था, और लॉकडाउन के कारण उन्हें मुंबई नहीं ले जाया जा सका था। दिल्ली हाईकोर्ट के जज जस्टिस अनूप जयराम भंभानी की सिंगल बेंच ने नवलखा के न्यायिक रिमांड की अवधि बढ़ाने के लिए एनआईए कोर्ट की दिल्ली पीठ के समक्ष स्थानांतरित किए गए आवेदन का पूरा रिकॉर्ड मांगा था। इसके अलावा तिहाड़ जेल के संबंधित जेल अधीक्षक की ओर से नवलखा को मुंबई स्थानांतरित करने की अनुमति के लिए दायर अर्जी की सुनवाई के लिए अदालत ने 3 जून, 2020 की तारीख तय की है। इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट ने 16 मार्च को गैरकानूनी गतिविधि निरोधक अधिनियम के तहत दर्ज मामले में गौतम नवलखा और आनंद तेलतुम्बडे को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया था। उन पर भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में माओवाद‌ियों से संबंध होने का आरोप लगाया गया था। ‌जिसके बाद, नवलखा ने 14 अप्रैल को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था। यह मामला एक जनवरी, 2018 को पुणे के पास भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा की घटनाओं से जुड़ा हुआ है। घटना के दिन कोरेगांव की लड़ाई की विजय की 200 वीं वर्षगांठ की स्मृति में दलित संगठनों ने कार्यक्रम आयोजित किया था। पुणे पुलिस ने आरोप लगाया कि कार्यक्रम के हुई एल्गार परिषद की बैठक में हिंसा भड़काई गई थी।आरोप लगाया गया कि बैठक का आयोजन प्रतिबंधित माओवादी संगठनों से जुड़े लोगों ने किया था। पुलिस ने जून 2018 में जाति विरोधी कार्यकर्ता सुधीर धवले, मानवाधिकार वकील सुरेंद्र गडलिंग, वन अधिकार अधिनियम कार्यकर्ता महेश राउत, सेवानिवृत्त अंग्रेजी प्रोफेसर शोमा सेन और मानवाधिकार कार्यकर्ता रोना विल्सन को गिरफ्तार किया था। बाद में, एक्टिविस्ट-वकील सुधा भारद्वाज, तेलुगु कवि वरवर राव, एक्टिविस्ट अरुण फरेरा और वर्नोन गोंसाल्विस को गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने जून 2018 में गिरफ्तार छह लोगों के खिलाफ पहली चार्जशीट नवंबर 2018 में, दाखिल की थी। फरवरी 2019 में सुधा भारद्वाज, वरवरा राव, अरुण फरेरा और गोंसाल्विस के खिलाफ पूरक आरोप पत्र दायर किया गए थे। गौतम नवलखा और आनंद तेलतुम्बडे का नाम आरोप पत्र में शामिल नहीं है। आदेश डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें
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