
यूपीएटा,जख्म खोदकर वोट निकालने की नीयत आजकी राजनीति का चलन बन गया है—
जैसे किसी बड़े नेता के आगमन पर रातों रात सड़कों के जख्म भर देना मुर्दों के आसपास के आँशू पौछ देना,क्या इन नेताओं को इस तरह की कार्यप्रणाली को चिंनि्त नहीं करना चाहिए सर्मनाक आजतक एटा की दुर्दशा को देखने कोई बड़ा नेता आया ही नहीं फिर प्रशासन क्यों ना लापरवाह हो एटा की बदहाली अंंधी आँखों से देखी जा सकती है पर नेताओं की गाड़ियों के काफिलों मे हिचकोले ना लगे यह ब्यबस्था रातों रात जुटादी जाती है तब जनता की पीड़ा कौन सुने जो पाँच सालतक हर विस्वास की सुई उसका धीमें धीमे से लहू निकालती रहती है महंगाई आज अच्छे खां से पैसे बालों का बजट बिगाड़ रही है तो अनुमान लगाया जा सकता हैकि आम आदमी क्या खाकर जिंदा रह रहा होगा हर निवाले पर कितना मलाल करता होगा कि आज स्वाद और अधिकारों की थाली मे आम आदमी धेर्य खा रहा है या जिंदगी जी रहा है यह हमारे अधिकारों के धीमे धीमे जहर है जो आदमी की भूँख, सोच, शक्ति, संसकारों, पर आदमी बनने मे कितनी बाधक बनी हुई है खोती समांतरता मे आखिर आदमी कितना संतुलन बनाकर रखे परिणाम आज हर तरफ साफ-साफ देखने को मिल रहे है युवा पीढी भविष्य की मंजिलों से दूर अपराधों के दलदल मे धसता जा रहा है जब राजनीति लक्ष्य हीन हो रही है तो समाज का आईना तो धूमिल होना ही है गौर करे राजनीति को पाने बाले कृत्यों को आदमी अपने अधिकारों की लडा़ई लड़ते लड़ते घिनौनी राजनीति पर उतारू हो जाता है जनता के धुत्कारे हुये कमजोर कंधो की तलाश मे जुट जाते है पश्चाताप की जगह कूटनीति होने लगती है पर गौर करें तो इन सबमे पिसता है गरीब कमजोर असहाय आदमी बेहद सर्मनाक राजनीति काम की जगह एक दूसरे को नीचा दिखाने मे समय की पूर्ति करते है और जनता अमूल्य वोट देकर ठगी रह जाती है सरकारें किसी की रही हो पर एटा अपनी दुर्दशा के लिये इतिहास बन चुका है।
दीप्ति।