
सरकारों की अनदेखी की कोख से बड़ी है पत्रकारिता की भीड़—
किसी भी सरकार ने यदाकदा को छोड़कर कलम को समझने या उसके अधिकार,सम्मान को देखने की कोशिश की होती तो न पत्रकारिता बदनाम होती न भीड़ बढती आज रोटियों ने आदमी को इतना बिवस कर दिया कि कलम भी ब्यापार बना दी गई क्योंकि कलम एक ऐसा लायसेंस है जो इतनी जल्दी निरस्त नहीं हो पाता है,आज सत्य भूँखा है बेघर और नंगा भी है,और यह देन सरकारों की है,जो पत्रकारिता का स्तेमाल तो कर रही है,उनके अधिकार और सम्मान की बातसे अनदेखी, सर्मनाक रहा कोरोना काल जिसमे सैकड़ों कलमकारोंको मौतने निगल लिया लेकिन उनके सव सरकारों के हाथ और अधिकारों से लावारिस ही रहे,जहां पत्रकारों ने हू हल्का मचाया तो कुछ हाशिल हो गया वरना सम्मान की—-हकीकत आज यह हैकि पत्रकार के कार्य से बड़ा कोई कार्य नहीं जो आज सरकारों की लापरवाही के चलते अपने लक्ष्य से भटक रहे है,साहब सत्य भी पेट रखती है।और वह भी परिवार और भूँख के आगे लाचार हो जाता है क्यों कि भूँख तो निवाला मांगती जो किसी भी जाति धर्म कर्म से परे है,तब यह कहना गलत क्या होगा कि सरकारों की अनदेखी से आज सत्य भी भ्रमित हो रहा है जो बेशक चौथी श्रेणी मे रखा गया है लेकिन सब कर्मों का ताज है,कलम ने बड़े-बड़े राज और तख्तोताज पलटकर रख दिये है,इतिहास गवाह है हमतो यही कहना चाहेंगे कि सबकुछ दावपर लगादो पर सरस्वती को ब्यापार मत बनने दोआज कुकरमुत्तों की फसल तरह—और आपकी अनदेखी का बीज है, सत्य की परख करना सीखें चाहे सरकारें हो या इंसान और समाज देर तो हो सकती है पर अंधेर नहीं कलम की ताकत को हल्का समझना किसी बिनास की आहट से दूर रहने के समान है मनन करना होगा सरकारों को समय रहते कि कलम हर कार्य के सरका ताज है न गुलाम,न ब्यापार।
लेखिका, पत्रकार, दीप्ति चौहान।