जज़्बे और ताकत के दम पर एक मजदूर से फौजी बने असली कश्मीरी नायक की कहानी

*जज़्बे और ताकत के दम पर एक मजदूर से फौजी बने असली कश्मीरी नायक की*
*कहानी।*

*फ़ौज में भर्ती* होने के कुछ साल बाद ही *अनपढ़ गुलाम नबी वाणी नायक बनके जम्मू कश्मीर लाइट इन्फेंटरी (JAK LI ) से रिटायर हुआ* लेकिन असल जिंदगी का नायक तो हमेशा रहा है. अच्छे खासे डील डौल के मालिक इस रिटायर्ड फौजी से जब भी सेना में भर्ती और युद्ध की बात की जाये तो उनके पूरे शरीर में अचानक से ऐसे फुर्ती आती है मानो अभी रणक्षेत्र में चल देंगे. हैरान कर देने वाली उनकी आपबीती तो आज के ज़माने के हिसाब से लोगों को शायद सपना या झूठ ही लगे. उनके सुनाये कुछ किस्से तो आजकल के सैनिकों तक को हैरान करने के लिए काफी हैं.

*पाकिस्तान के साथ 1965 और 1971* के युद्धों में सक्रियता से हिस्सा ले चुके और युद्ध भूमि में ही अपनी हिम्मत, फुर्ती और ताकत के बूते पर रैंक की तरक्की पाने की उनकी आपबीती भी ऐसी ही एक दिलचस्प घटना है. ठीक किसी मंजे हुए फिल्म डायरेक्टर की तरह तमाम हालात को गुलाम नबी वाणी जब बयान करते हैं तो कोई भी उनको लगातार देखे और सुने बगैर नहीं रह सकता. ये घटना 1965 में गुरेज़ सेक्टर की है. पहाड़ के दूसरी तरफ से फायर कर रहे पाकिस्तानी सैनिकों के फायर का जवाब देने और उनकी पोस्ट कब्जाने की रणनीति पर कर्नल रैंक के उनके कमांडिंग ऑफिसर ने ऊंचाई पर मोर्टार लगाने का हुकुम दिया था. उस जगह की निशानदेही करके कर्नल लौटते, उससे पहले ही गुलाम नबी वाणी मोर्टार के तीन हिस्सों में से एक सबसे भारी वाला हिस्सा यानि बेस प्लेट लेकर वहां पहुँच भी गए थे. फ़ौजी सामान के साथ साथ तकरीबन 100 किलो से ज्यादा की बेसप्लेट उठाकर इतनी जल्दी पहुंचाने से कर्नल इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने वहीं अपना पेन निकाला और गुलाम नबी वाणी के दाहिने बाजू पर लांस नायक की फीती बना दी. यानि युद्ध भूमि में ही गुलाम नबी वाणी हवलदार से लांस नायक बना दिए गए. ये वो जगह है जहां मई जून में भी बर्फ रहती है. यहाँ इनकी कम्पनी ने पाकिस्तान की जसमीन चौकी पर कब्जा कर लिया था.

*बंदूक की ट्रेनिंग डंडों से*

वो ज़माना था *जब थ्री नॉट थ्री राइफल पुलिस के पास भी थी और सैनिक भी इस्तेमाल करते थे.* हथियार की बात करते ही गुलाम नबी वाणी के चेहरे पर मुस्कराहट आ जाती है. दाहिने हाथ के अंगूठे और ऊँगली से अपनी ठुड्डी पकड़ते हुए पल भर के लिए सोचने वाले वाले अंदाज़ से उनकी आँखे शून्य की तरफ देखती हैं, फिर कहते है,’ मुझे अगर ठीक से याद है तो मेरी राइफल का नम्बर 210 था, बट पर यही लिखा था’. लेकिन जब हथियार चलाने की ट्रेनिंग की बात पूछने पर उन्होंने जो जवाब दिया उसे सुनकर हम ही नहीं आसपास मौजूद उनके दोस्त रिटायर्ड राइफलमैन अब्दुल अहद मटकू के परिवार वाले भी अवाक रह गये. *“साहब, हमारी ट्रेनिंग डंडों से हुई थी,* हम डंडे की बनी बंदूक से सीखते थे. डंडे के पीछे का थोडा सा हिस्सा काला होता था जिसे बंदूक का बट माना जाता था और अगला हिस्सा सफेद (पेंट से) होता था जिसे बैरल मानते थे. धागे और रस्सी से ट्रिगर आदि बनाया जाता था.”

*ऐसा भला क्यों? ग़ुलाम नबी वाणी का जवाब था,” साहब, बन्दूक थी कहाँ?* इतने रंगरूटों को सिखाने के लिए एक दो ही राइफल हुआ करती थी.” खैर डंडे वाली ट्रेनिंग में तब सैनिकों को बंदूक के बारे में मोटे तौर पर जानकारी दी जाती थी. अलग अलग तरह से पोजीशन लेना वगैरह सिखाया जाता था. डंडे के जरिये ट्रेनिंग की बात सच में ये झटका देने वाली थी जो ज़ाहिर करती है कि कितने कम साधनों के बावजूद भारतीय सैनिकों ने अपने हौसले, ताकत और जज्बे के दम पर उस दौर में भारत की सीमाओं की चौकसी की और दुश्मन से मुकाबला किया. ये जज़्बा कहां से आता है ..! इस पर नायक गुलाम नबी वाणी का तो यही कहना था कि उन्हें अक्सर ऐसे मौके पर जम्मू कश्मीर के तत्कालीन रियासते सदर शेख अब्दुल्ला की कही जोशीली बातें याद आ जाती हैं जो उन्होंने 1964 में हफशनार में कसम परेड (पासिंग आउट परेड) में कही थीं.

*गुलाम नबी वाणी से मुलाकात* उनके दोस्त अब्दुल अहद मटकू के घर पर हुई थी जो जम्मू कश्मीर के अनंतनाग स्थित कोठाएर गाँव में है. ये हरा भरा पहाड़ी इलाका है जहां के पुरुष अच्छी कद काठी के तगड़े जिस्मों के मालिक हैं. थोड़ा सा भी भरोसा हो जाये तो अजनबियों से खूब खुल कर बात करते हैं और साथ ही मेहमान नवाज़ी भी.

*मज़दूर से बना फौजी*

फ़ौज में भर्ती कैसे हुए? सवाल करते ही हंसने लगते हैं गुलाम नबी वाणी और जो उन्होंने जो जवाब दिया उसे सुनकर कोई भी जल्दी से यकीन नहीं कर सकता कि 60 के दशक में सेना में इस तरह भर्ती हुआ करती थी. अपनी उम्र भी ठीक से याद नहीं रख पाने वाले गुलाम नबी वाणी का ताल्लुक बेहद गरीब परिवार से था. दिन भर लकड़ियाँ बीनना या गाँव में घर का छोटा मोटा काम करने के अलावा कुछ नहीं आता जाता था. जिस्मानी ताकत अच्छी थी सो मकान बनाने के काम में मजदूरी करने लगे. एक दिन की मजदूरी के बदले में सिर्फ दो आने (12 .5 पैसे) मिलते थे.

*ऐसे ही एक दिन नोगाम में काम कर रहे थे. वहीं पर सेना में भर्ती के लायक नौजवानों को तलाशती सेना की टीम आ गई. इसका शोर मच गया. गुलाम नबी और इनके एक दो साथी मज़दूर भी भर्ती देखने पहुँच गये. तभी भर्ती टीम के एक सदस्य की नजर गुलाम नबी वाणी पर पड़ी लेकिन गुलाम नबी को पढ़ना तो क्या गिनती तक नहीं आती थी.* स्कूल की शक्ल तक कभी नहीं देखी थी. वहीं बीच रास्ते पर ही गुलाम से दौड़ लगवाई, वजन उठवाया और इसका नतीजा देखते ही बस गुलाम को चुन लिया गया. भर्ती वाली टीम अपने साथ दफ्तर ले गई. तब जम्मू कश्मीर मिलीशिया हुआ करती थी. सेना में भर्ती होने के बाद उनको 40 रूपये प्रति माह वेतन मिलने लगा. जिंदगी काफी बदल गई. फ़ौज उन्हें बहुत रास आई. मन लग गया.

*युद्ध 1971 का*

1971 में पाकिस्तान से फिर युद्ध हुआ. विभिन्न सीमाओं पर लड़ाई छिड़ी हुई थी. गुलाम नबी वाणी बताते हैं कि तब उनकी कम्पनी राजौरी में थी. वे सुंदरबनी में 02 पिकेट पर थे और सियाकोट के किले की तरफ से दुश्मन फायरिंग कर रहा था. ये फासला करीब डेढ़ -दो किलोमीटर का था. तब 17 पंजाब और जाट रेजिमेंट के साथ मिलकर बकरीवाला नाला पार करके वो पकिस्तान में जा घुसे थे. इसी एक्शन के दौरान एक दुश्मन का एक शैल उनसे थोड़ा दूर गिरा था जिससे निकले कुछ छर्रे या कुछ वैसा गुलाम नबी वाणी की टांगों में लगा था. गुलाम नबी कहते हैं कि वो मामूली चोट थी, ” हमारे पास जो थोड़ी बहुत दवाई पट्टी थी, उसी से इलाज कर लिया”. *इस युद्ध के बाद उनकी यूनिट उधमपुर और फिर रुड़की (उत्तराखण्ड) आ गई थी. यहीं से 1978 में गुलाम नबी वाणी रिटायर हुए. तब पेंशन भी 40 रूपये ही मिलने लगी. इसके बाद श्रीनगर स्थित आग्नेयास्त्र डिपो (FAD) में उनको पूर्व सैनिक के तौर पर सुरक्षा गार्ड का काम मिला.*

*जब दस्तखत करना सीखा :*

गुलाम नबी के फौजी जीवन का सबसे दिलचस्प वाकया तब का है जब उनकी यूनिट उधमपुर में थी. लांस नायक बन गये थे लेकिन गुलाम नबी वाणी को लिखना पढ़ना तो क्या अपने दस्तखत करने तक नहीं आते थे. तब उन्हें साथियों ने 1 से 10 तक की गिनती सिखाई और नाम के पहले शब्द को अंग्रेज़ी के दो अक्षर जी एच (G H ) लिखकर कर दस्तखत करने सिखाये. और भी मज़ेदार बात ये हुई कि जिस दिन उनको तनख्वाह मिली और उन्होंने *तनख्वाह वाले रजिस्टर पर अंगूठा लगाने की जगह दस्तखत किये उस दिन उनके उस्ताद पलटन के एक हवलदार ने अपनी जेब से 50 पैसे खर्च करके मिठाई बांटी.*

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

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