एटा सीडीओ निलम्बित, बच गया हेरफेर करने वाला सीडीओ कार्यालय का स्टाफ

एटा सीडीओ निलम्बित, बच गया हेरफेर करने वाला सीडीओ कार्यालय का स्टाफ

एटा। जिला पंचायत के वार्ड नं0 10 में हुई हेरफेर के कारण जीते हुए भाजपा प्रत्याशी को हराने और हार रहे प्रत्याशी को जीत का प्रमाण पत्र देने में चर्चित रहे रिटर्निंग आफीसर अजय प्रकाश मुख्य विकास अधिकारी एटा को शासन ने निलम्बित कर मुख्यालय से सम्बद्ध कर लिया है। मुख्य विकास अधिकारी का कार्यभार सुनील कुमार एडीएम (वित्त एवं राजस्व) को दिया गया है।
उल्लेखनीय है कि गत त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में वार्ड सं0 10 के भाजपा प्रत्याशी गजेन्द्र सिंह की स्थिति मजबूत होते हुए भी उन्हें हराकर समाजवादी पार्टी प्रत्याशी साधना सिंह को विजयी होने का प्रमाण पत्र दे दिया गया था। जिसे लेकर भाजपा के स्थानीय विधायकों और कार्यकर्ताओं ने जिला मुख्यालय पर धरना प्रदर्शन किया। तत्कालीन जिलाधिकारी डाॅ0 विभा चहल ने पहले तो अपने अधिकारी कर्मचारियों द्वारा कोई हेर फेर किये जाने से इंकार किया लेकिन ज्यादा दवाब बनने पर उन्होंने पुनः आंकड़ों की जांच कराई जिसमें यह साबित हो गया कि वास्तव में भाजपा प्रत्याशी गजेन्द्र सिंह विजयी हो रहा था। तब फिर गजेन्द्र सिंह को जीत का प्रमाण पत्र देते हुए साधना सिंह को दिये गये प्रमाण पत्र को निरस्त घोषित किया गया।
इसी प्रकरण को लेकर जिलाधिकारी डाॅ0 विभा चहल द्वारा मुख्य विकास अधिकारी अजय प्रकाश तथा जिला उद्यान अधिकारी नलिन सुन्दरम भट्ट पर कार्रवाई करने हेतु शासन को पत्र लिखा गया। जिसकी परिणति मुख्य विकास अधिकारी के निलम्बन के रूप में हुई है।
आपको अवगत करा दें कि चुनावों में धांधली की शुरूआत कर्मचारियों की ड्यूटी निर्धारित करते समय ही तय हो जाती है। मतदान कराने वाली पार्टी जिस प्रत्याशी को जिताना चाहती है उसे जिताने के लिए तमाम हथकंडे अपनाती रही हैं। जिस प्रत्याशी के जिस बूथ पर वोट ज्यादा पड़ रहे हैं और उसे हराना है तो वहां वोटरों के आइडी प्रूफ में तमाम कमियां निकालकर वोट ही नहीं पड़ने दिये जाते अथवा वोट डलवाने की गति धीमी कर दी जाती है। यह सब कार्य मतदान कराने वाली टीम करती रही हैं, उसके बाद भी जिसे जिताना है तो मतगणना वाली टीम इस कार्य को फाइनल टच देती है। इस बार के त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में कर्मचारियों की ड्यूटी डालने का कार्य भी मुख्य विकास अधिकारी कार्यालय के कर्मचारी के अधीन ही था। मुख्य विकास अधिकारी पर तो कार्रवाई हो गई लेकिन उनके कार्यालय के स्टाफ में स्थानीय (एटा जनपद के निवासी) और बीस-बीस वर्षों से एक ही पटल पर अंगद के पैर की भांति जमे हुए कर्मचारियों का बाल भी बांका नहीं हुआ। किसी भी गलत कार्य के लिए अधिकारी स्तर पर बहुत ही कम बात होती होगी, उसमें मुख्य भूमिका स्थानीय स्तर पर निवास कर रहे कर्मचारियों की ही रहती है। क्योंकि विभिन्न राजनीतिक दलों के पदाधिकारियों से स्थानीय कर्मचारी ही सम्पर्क में रहते हैं और उनसे मलाईदार पदों पर स्थानांतरण कराने अथवा रूकवाने में मदद लेते रहते हैं। साठ-गांठ के असली सूत्रधार तो यही कर्मचारी होते हैं जो अपने अधिकारियों को प्रलोभन में फंसाकर विधि विरूद्ध कार्यों को करा लेते हैं। इनके विरूद्ध कार्रवाई न हो तो कम से कम इनके पटल तो बदले ही जाने चाहिए।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

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