
#एटा,जैसे हवा मे दीपक फड़फड़ाता है,आजकल वादों की कमजोर नीव के धसकने से कुर्सियां भी डगमगा रही है,फिर चाहे पार्टी कोई भी क्यों ना हो।,
एटा-राजनीति की जुवांन और वायदे
,किसी का जमीन मे धसा मुंह चमकने लगा है,कोई आसमां से नीचे आने लगा है,ये पब्लिक है इससे खेलना अच्छी बात नहीं है जैसे हाथों की हर उँगली बराबर नहीं होती है उसी तरह हर पब्लिक की सोच एकसी नहीं होती काम जब बोलता है तो जुंवा खामोश हो जाती है समय अपना निरंतर चलने का काम करता रहता है,और आदमी दिमाग के रास्ते बनाने मे समय जाया करता है समय अपना कार्यकाल समय पर पूरा कर जाता है,
और आदमी-आदमी को लूटने मे लक्ष्य से भटक जाता है–
तब अपनी बात मे इतना तो बजन रखो कि वह हवा मे न उड़ते हुये सोच दिल और जमीन पर ठहर जाए—
जुवानों की जंग आजकल भरोसे से परे होती जा रही है,नुकसान पब्लिक का तो खुलेआम दिख रहा है पर सुरक्षित तो कुर्सियां भी नहीं है,वादों के बिस्तार ने जमीन घेरली काम हवाहवाई हो रहा है समय और काम दोनों की तुलना सरकारों को अवश्य करनी चाहिये, आसियाये गरीबों के आज सालों से अभी पैंडिंग मे अटके हुये है, बेछतों को नशीब नहीं हो पा रहे है,
जाने कितने मौसम आए और चले गये खुले आसमां के नीचे कहर बरफाकर, हां सरकार का ये सराहनीय सहयोग है,फ्री राशन गरीबों के लिये,
पर इस थाली से बहुत से अमीरों की थाली भी सज रही है, गांव हो या शहर उन गरीबों की बिजली भी मुफ्त होनी चाहिये जो दो जूनकी रोटी खाकर बस साँसों की परवरिश ही कर पारहे है,रात के अंधेरे मे मौसम और मच्छरों के डंस से इन गरीबों का खून चुस्बाते गुजर जाती है नींद आँखों मे करवटें लेकर भोर हो जाती है,फिर वही अल्साई हुई दिनचर्या मे दो जूनकी रोटी जुटाना यह इनकी दिनचर्या मे सामिल है,सच कहती हूँ कि इन गरीबों की यह सेवा उन चोर अमीर जादों से हो सकती है,जो कटिया डालकर आँखों मे–और विभाग के सहयोग से अमीरों की सेवा करते है,समाज शहर गांव मे एसे बुजुर्गों की कतार दिखा सकती हूँ जो औलाद की ठुकराई हुई जिंदगी का बोझ अपने ही झूलते कंधों पै उठाए फिरते है,
पांचसौ रूपये की पेंशन की सौगात और तीसरे महीने मिलना
बहुत बड़ा और दर्ददेय विषय है,इस महंगाई मे अमीरों की एक दिनकी सब्जी नहीं आती है पांचसौ रू,मे आप महीने भरके गुजारे की सौगात समझते हो,
जो बुढापे की मर्ज की दवा तक नहीं खरीद सकती हैआपकी यह पेंशन
मैभी नहीं कहूंगी कि सरकार कुछ कर नहीं रही है पब्लिक के लिये,अच्छा कर रही है लेकिन कुछ संसोधन और समय पर अवश्य ध्यान देनेकी जरूरत है,कोरोना से भी भंयकर रोग है गरीबी इनके अधिकिरों का बंदरबांट अमीरों के हाथ से बचाने की आवश्यकता है।