
राजनैतिक छवि निर्माण के टूलकिट !
इन दिनों राजनैतिक गलियारों में छवि निर्माण के टूलकिट की भारी ज़रुरत देखी जा रही है. ख़ासतौर उन लोगों की जिनकी छवि कोरोना काल में इस कदर खराब हुई है कि लोग उन्हें रामनामी में लपेट गंगा मां को सौंपना चाहते हैं क्योंकि उनके दिल दिमाग में अपनों की यह वीभत्स छवि निरंतर चीत्कार कर रही है।इन दृश्यों ने ना केवल देश में बल्कि विदेशों में भी हमारी छवि ख़राब की है।
बहरहाल सत्ता का आज्ञाकारी पिट्ठू कोरोना आदेश मिलते ही आंख मिचौली खेलने लगा। वह गायब तो नहीं हुआ लेकिन सरकारी आंकड़ों के मुताबिक पस्त ज़रुर हो रहा है। कर्फ्यू हटना शुरू हो गया है और अब छवि निर्माण का माहौल जल्द बनने वाला है। सबसे बड़ी बात तो ये भी है कि प्रशांत किशोर जैसे छवि निर्माता ने संन्यास ले रखा है। तब कौन और कैसे कौशल के साथ काम करेगा इस पर विगत दिनों संघ के मार्गदर्शन में कुछ निर्णय लिए गए थे जिनके सार्वजनिक होने और ठकुराई अंदाज वाले योगी की सख़्त भाषा के बाद इसमें उलट फेर किया गया है। जिसमें सबसे बेहतर यही है कि दोंदाठेली कर सही प्रचार को इतना झूठ में लपेटकर सामने रखो कि वह मिथ्या साबित हो। कोरोना काल को भुलाया जा सके। इसके लिए सेवाभावी जुनून पैदा कर जनमत की भावनाओं को भाजपा के साथ खड़ा किया जाए और जब चुनाव करीब आ जाए तो राममंदिर निर्माण को पूरी संवेदनशीलता के साथ जनता में परोसा जाए। राम के नाम पर सभी हिन्दू आसानी से भाजपा के साथ जुट ही जाते हैं। रही अल्पसंख्यक समुदाय की बात तो उसे कुचलने गुजरात की दमदार जोड़ी से ज्यादा ताकतवर गोरखनाथ मठ का योगी तो है ही। फिलहाल टूलकिट के लिए इतना ही मसाला मिल पाया अभी यादवों और पंडितों के इलाज हेतु सुझावों को आमंत्रित किया जा रहा है। शुभचिंतकों से अपील है कि वे अपने सुझाव ज़रूर भेजें। हां, बहिन मायावती और चंद्रशेखर के तमाम दलित साथियों से कोई ख़तरा नहीं है। वे जब चाहेंगे साथ चले आऐंगे। कुल मिलाकर अब तक इन मुद्दों पर काम होना है ।
वास्तव में संघ परिवार ने बहुत ही बुद्धि मत्ता का परिचय देते हुए अपनी रणनीति बदली है। ऐसा महान भगवाधारी यदि नाराज हो जाता तो उसके शाप से भाजपा भी गंगधार में बह जाती। सो, जो जहां है जैसा है, हमारा है जो किया वह शिरोधार्य, बस छवि निर्माण का काम ज़रुरी है। अपनों का प्रेम कम नहीं होना चाहिए। लोगों को इधर उधर आयोग आदि बनाकर सेट करो। जरुरी हो तो ईडी वगैरह वगैरह का सहयोग भी लिया जा सकता है। दूसरी पार्टी के लोगों को दिवा स्वप्न के सहारे शामिल करो। सिंधिया जैसे लोगों की तलाश करो ये नये टूलकिट कितने फिटफाट रहे आज तक चूं चपाड़ नहीं।
चुनाव में तो देखिए देर सबेर साहिब को आना है यदि पहले निर्णय को वापस नहीं लिया जाता तो साहिब की जुगल जोड़ी कैसे मैदान में रह पाती। यह सुधार संघ ने भविष्य को देखकर ही लिया लगता है।वरना अपने अधिकारों से वंचित केंद्रीय मंत्री भी बगावत कर सकते थे। दूसरे, बंगाल में जिस तेजी से तृणमूल से भाजपा में गए 33 लोग घर वापसी के लिए बेताब हैं उसने भी भाजपा की सांसे फुला रखी हैं। इस पर काम जरुरी है। लगता है अब उत्तराखंड के त्रिवेंद्र और तीरथ रावत जैसी गल्ती कहीं नहीं होगी। योगी के साथ शिवराज भी सुरक्षित हो गए हैं वरना यहां भी धमा चौकड़ी शुरू हो ही गई थी।
यह जनता के लिए भी अच्छा निर्णय है कि वे अपने बीच पांच साल काम किए नेता को ममता, विजयन जैसी वापसी दिलाए या असम जैसे सर्वानंद सोनोवाल की जगह हिमंत सरमा को बिठाकर या गिराकर अपना मत प्रकट करे। यह लोकतांत्रिक कदम भी होगा और जनता को भरपूर अवसर प्रदान करेगा।
बहरहाल, संघ के फैसले के बाद चुनावधर्मियों में ख़ुशी की लहर व्याप्त है, सर्जरी से बचे नेता भी प्रसन्न है। भाजपा टूलकिट ने अब तक विरोधियों की धड़कनें नहीं बढ़ाई है। देखना है वे कब तक अपने जवाबी टूलकिट को लेकर आते हैं, शायद वे अपनी छवि निर्माण को ज़रुरी नहीं समझते ?