घरमे माँ बाहर प्रकृति रो रही है,,

#विश्वपरियावरणदिवसकीहार्दिक शुभकामनाएं,
आदमी के हाथों मे खंजर देखकर,
घरमे माँ बाहर प्रकृति रो रही है,,

वस्त्र बिहीन धरा की आप बीती,
विश्व परियावरण दिवस पर उसी की जुवानी अपनी कलम से आपतक संदेश मय पहुंचाने की कोशिश कर रही हूँ,
अंग भंग करके मुझे तपते शोलों मे छोड़ दिया है,मुझ प्रकृति की कोख को बंजर बनाकर,मै हरियाली मे लिपटी सिमटी सर्मीली सी दुल्हन थी,चीरहरण कर मेरा मुझको नंग्न कर दिया,मेरी पीणा सुनने और देखने को, अब मूंक बधिर, और बहरे हो गये,स्वार्थ और सुख सुविधाओं की खातिर,आज विश्व पर्यावरण दिवस है मुझे बहलाने के लिए या फिर अपने चेहरे चमकाने के लिए अपने हाथों में मेरे अंकुर लिए फिरते हो मेरी ममता को बहलाने के लिये,या फिर अपने चेहरे—–कलसे यही अंकुर तढप-तढपकर एक-एक बूंद पानी के लिये दम तोड़ देगे कोई नहीं होगा सुनने देखने और पानी देने बाला अपनी सयानी नीयत का पर्व मनाता आदमी प्रकृति के कातिल हाथ मे खंजर लिये, घूमता आदमी मेरी शक्ति से अनभिज्ञ है,मेरी हरियाली मे खुशहाली भी बहुत है मेरे आँशुऔं मे तबाही भी बेसुमार है,खुश होकर बरषूं तो किस्मत के दाग धो दूं क्रोध मै सैलाब—-अब जुल्म इतना सह गई हूँ मै धरा, धेर्य के अंतिम पतन पर हूँ खडी़,अंग भंग जब देखती हूँ वदन अपना,पीजाती हूँ जख्मों की प्यास मे आँशू,पर थमा नहीं कातिल मेरा, अब तेरे पदचिन्हों के पीछे-पीछे धीमे-धीमे मै चलने की तैयारी मे हूँ, रोक सके तो रोकले मेरे दिलकी ज्वाला को वापस करके मेरी हरियाली, मै प्रकृति धर्मों की नही हर जिंदगी की सांँसें हूँ,मेरी साखाऔं और छांव मे हर जीवन को पनाह देती हूँ,आज आदमी की स्वार्थी सोचने प्रकृति को अंग भंग करके अपना बाजार तराश लिया है परिणाम से बेखबर होकर आज छोटी-छोटी झल्कियों मे मेरे दर्शन हो भी रहे है, पर आदमी अपनी सार्थक सोच को स्वार्थ के हाथों गिरवी जो रख चुका है,आज बीमारियों ने अमरबेल की तरह बढना शुरू कर दिया है,क्या करे वह doctor और वैज्ञानिक जिन्होंने इन बीमारियों की डिग्रियां ही नहीं पढी पढने मे बक्त लगता है,तबतक साँसे अल्विदा हो जाती है,तब प्रकृति की नाराजगी से बचने के लिये,हमे पुनः वापसी करनी होगी है मन क्रम वचन के साथ इसको इसकी हरियाली देनी होगी,घरमे माँ बाहर प्रकृति रोने लगी है,बचालो इन आँशुऔं के सैलाब से यहा खुदाकी खुदाई भी कमजोर पड़ जाएगी, आज विश्व परियावरण दिवस है,हाथमे पौधा पकड़कर फोटो खिचवाने का चलन छोड़कर पौधा लगाकर उसकी परवरिश का संकल्प लें तो इसके क्रोध की ज्वाला थोड़ी ठंडी हो सकती है,हम भटककर बहुत आगे निकल चुके है आओ वापसी का संकल्प ले वही सही मायनों मे विश्व परियावरण दिवस का पर्व होगा।
लेखिका, पत्रकार, दीप्ति चौहान।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

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