साइकिल पर बोरा, बोरे में बेटी… बोरे से झांकती आंखे

*साइकिल पर बोरा, बोरे में बेटी… बोरे से झांकती आंखे, मानों सिस्टम से सवाल कर रही हों*


कोरोना वायरस की वजह से देश में लगा लॉकडाउन 56 दिन से ज्यादा हो गया है. लॉकडाउन-4 चल रहा है. इस दौरान दिहाड़ी मजदूरों के पास रोजगार नहीं हैं. कल-कारखाने लगभग बंद ही हैं, तो उनके सामने रोजी-रोटी का संकट है. ऐसे में वे महानगरों से अपने गांव-घर की तरफ़ लौट रहे हैं. जो जैसे है,वैसे ही घर के लिए निकल पड़ा है.

दिल्ली से यूपी लौट रहे मज़दूरों की ऐसी ही एक तस्वीर सामने आई है. इस तस्वीर में एक परिवार अपने रिश्तेदारों के साथ दिल्ली से यूपी के गांव लौट रहा है. लोग पैदल ही चल रहे हैं. लेकिन, एक शख्स साइकिल पर सामानों को लादा हुआ है. लेकिन, इसी में वह आगे रिंग पर एक बोरिया का झोला बनाया है.

इस झोले के अंदर की जो तस्वीर है, वह झकझोरने वाली है. इसमें उस मज़दूर की बेटी है. वह दिव्यांग है. ऐसे में मज़दूर ने जुगाड़ से बोरे का झूला बना लिया है और उसी में अपनी बेटी को लिटा लिया है. फोटो में उसका चेहरा दिख रहा है. इसमें जैसे उसकी आंखें झांखते हुए सवाल कर रही है.

ये आंखें जैसे सवाल कर रही हों. सिस्टम से. कि क्यों नहीं हमें सुविधा मिल रही है. क्या इस महामारी के दौर में भी हमतक साधन नहीं पहुंच सकता. जिस दिल्ली से पूरे देश की रूप-रेखा तय होती है, वहीं से ये लड़की इस तरह उस राज्य की तरफ़ बढ़ रही है जिसे लोग कहते हैं कि दिल्ली की रूप-रेखा तैयार करता है. फिर क्यों? कहां चूक है.

इस बच्ची के पिता ने कुछ खाने क सामान भी बांध रखा है. लेकिन, इस तपती धूप में वह कितना असरकारी रहेगा नहीं कहा जा सकता. किन परिस्थितियों में ये परिवार आगे बढ़ रहा, नहीं कहा जा सकता. उसके साथ कुछ बच्चे नंगे पैर भी चल रहे हैं.

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