
#यूपीएटा,
एटा-ये शहर पानी पानी है, या रखवाले,
जरा देखो तो चंद बूँदों ने, केसा धो दिया है चेहरा शहर का—–
कुछ सही पब्लिक तो तबाही मे रहने कीआदत बना चुकी है,लेकिन शहर के रखवालों के चेहरे चंद बूँदों मे चमक रहे है जरा देखो तो शहर की हालत हर गली सड़क कालोनी कीचड़, कीचड़ है,सीवर लायन का आविष्कार शहर मे सर्मनाक मंजर को दर्शा रहा है,जो गड्ढों और उबड़खाबड़ सड़कों मे राजनीति, शासन, प्रशासन, और अधिकारियों, इसमे रहने बाले नेताओं, की कार्यप्रणाली जो अबतक मिट्टी के पर्तों मे दबी थी वह चंद बूँदों ने साफ करदी तब यह लोकडाउन बड़ी राहत दे रहा है कि पब्लिक घरों मे कैद है तो हाथ पैर तो सुरक्षित है,कमसेकम सच क्या है, हम नहीं जानते पर सरकार तो आंकड़ों मे दिखा रही है पैसे की कोई प्रोब्लम नहीं है,फिर ये शहर और पब्लिक के अधिकार किसकी नीयत ने गिरवी रख रखे है,हाँ ये कहना सौ सत्य होगा कि स्वार्थी पब्लिक भी अपने और शहरों के विकास के बड़े रोड़े है,जो थोड़े से पैसों और पउऔं मे वोट को बेच देते है,कुछ मूंक होकर तमाशा देखने बाली बहरूपिया भीड़ भी—–एटा के विकास को सही मायनों मे आंकलन किया जाए तो एटा की पब्लिक ही सबसे बड़ी गुनहगार है जिसने एटा को पूर्व से लेकर अबतक उबरने ही नहीं दिया कहीं धर्म तो कहीं पैसों ने शहर के मुंह पर ऐसी तबाही लिखी कि अबतक मिटने का नाम ही नहीं ले रही परिणाम इलाके को बदनामी से उबरने के लिये किसी भी सरकार ने किसी भी उद्योग की स्थापना करने की पहल ही नहीं की बढती मंहगाई पेट और परिवार आखिर बेरोजगारी की भेंट चढता चला गया, नई पीढी आने बाले भविष्य के कर्णधार शिक्षा और संसकारों से दूर शराब और शबाब मे डूबता चला जा रहा है,जाने कितने पुलिस प्रशासन, एटा के शराब उद्योग नष्ट करकरके चले गये, लेकिन ये कम होने की बजाय और फलता फूलता चला जा रहा है,सभ्य इंसान ऐसे माहौल से या तो पलायन कर रहा है या फिर मजबूर जिंदगी जीने को बिवस हो रहा है,लेकिन बड़े बडे़ नेताओं का यहां आना भी नाके बराबर रहता है,इसका ही फायदा छुटभैया उठाते चले जा रहे है,आज अच्छा इंसान बदलती राजनीति से दूर भागने लगा है,हास्यास्यप्रद और दुर्भाग्य यह भी सबसे बड़ा है कि गुनहगार,और अपराधियों को राजनीति मे दाखिला गड्डियों के आधार पर अच्छी तरह मिल जाता है,और घूमफिरके कुर्सियों पर वही आजाते है जो पब्लिक के खून पशीने की कमाई से अपनी अपनी तिजोरियां भरते है,और हम भुक्तभोगी होकर बार,बार लौट फिरके अपनी तबाही खरीद लेते है,राजनीति जब कुंडली देखकर होने लगे तो समाज और पब्लिक की दुर्दशा निष्चित होनी है,काम बोलता है साहब लेकिन आज धर्म बोलने लगा है,हम मौके की तलाश करते है राजनीति करने के लिये नहीं अपनी आपूर्ति करने के लिये भूलकर कि पब्लिक की ताकत लोहा की तरह होती है,जिसका हथौड़ा भी बनता है और राजनीतिक सोने की तरह जिससे गहने बनते है।काम बोलता है,जिसे आजकी राजनीति ने गूंगा,बहरा,और अंधा,समझ रखा है।