इंसान नही जल्लाद कहा जाए तो बुरा नहीं होगा,,


ये जो श्यमसान की कोख खोदकर आपने रोजगार निकाला है,
इंसान नही जल्लाद कहा जाए तो बुरा नहीं होगा,,
रोजगार करने बालों को कही भी और कोई भी रोजगार मिले अवसर नहीं गवाते है,अब देखिये इस कोरोनाकाल महामारी जैसी आपदा मे एक तरफ इंसान साँसों की घुटन से मौत से लड़ रहा है,तो ओक्सीजन की कालाबाजारी हो रही है,और इंसान ओक्सीजन के अभाव मे असमय मौत का निवाला बन रहा है,इस कालाबाजारी ने जिस इंसान को मौत के मुंह मे चंद शिक्को के लिये—-उस परिवार से उस इंसान की अहमियत पूंछिये कि भविष्य मे उस परिवार को आपदा मे बसा दिया,शिक्को से कई गुनाह जरूरत उस इंसान की उस परिवार को थी जिसकी साँसों पर आपने अपना रोजगार तलाश लिया,बच्चे आपके भी हैं साहब और मरने बाले के भी जो अपने पिता, और माता, से बिछड़ गये आपके इस घिनौनी नीयत की बजह से पता नहीं उस परिवार की हाय आपको कहां से कहा लेजाए इससे इन्कार नहीं किया जा सकता आप यह भी नहीं कह सकते है कि दुनियां मे ईश्वर नहीं है,देर जरूर है साहब अंधेर तो नहीं हो सकता है,माना कि पैसा बहुत कुछ है पर किसी का माई बाप नहीं हो सकता है जो आपने श्यमसान की धरती की कोख खोदकर निकालना शुरू किया है,इस बक्त दोस्त रिस्तेदार समाज सरकार, और जो इस वायरस की तबाही मे हमे घरमें सुरक्षित रखने के लिये, बाहर जाकर हमारी सुरक्षा मे अपनी जानकी बाजी लगा रहे है,इनके लिये हम कुछ नहीं कर सकते है,तो दिलसे दुआ तो मांग सकते है इनके लिये,इनके परिवार के— यह भी किसी की संतान है जो पेट और परिवार और हमारे लिये अपनी साँसों की परवरिश न करते हुये हमारी साँसों के लिये सड़कों, और दफ्तरों मे रोज अपने फर्ज को निभा रहे है, तब हमे याद दिलाना होगा कि इंसान से बडी़ कोई शक्ति नहीं और इंसान से बड़ी कोई तबाही भी नहीं जो आजकल इस भयानक आपदा के दौर के साथ-साथ कुछ इंसान भी सामिल लिये है जो साँसों पर रोजगार कर रहे है,एसे ब्यापारियों को जल्लाद कहने मे कोई संकोच नहीं है जो कमजोर साँसों पर ब्यापार कर रहे है आपका मात्र भ्रम है कि आप अपने परिवार और बच्चों के लिये एसे पैसे से बेहतर भविष्य और रोजी रोटी इकट्ठा कर रहे हो, नहीं बद्दुआ और अंतिम साँसो से हाय कमा रहे हो,
बडी़ पुरानी कहावत है कि हाय बुरी गरीब की जो स्वर्गलोक तक जाए—-ईश्वर का फैसला जस्ट नहीं होता है इंसानों की तरह ईंट का जबाब पत्थर— हर फ्रूफ जुटाकर होता है,जैसे आजकल हमपर प्रकृति का कहर कोरोना के रूपमे ढा रहा है,सोचो इस प्रकृति पर हम इंसान कबसे रोजगार कर रहे है पेड़ पौधे काटकर निर्वस्त्र करदी धरा,खोदकर प्यासी, परिणाम आज हमारे सामने है ईश्वर से बडी़ कोई आपदा नहीं उसकी मर्जी के बिना कोई पत्ता भी नहीं हिल सकता है,तब हमे अपनी नीयतों पर काबू और पश्चाताप करके इसकी पुनः गणना करनी होगी वरना ये हमारे बीचमे हमारे गुनाहों पर अदालत लगाकर बैठ चुकी है,कितने रूपमे अवतार ले सकती है हमे इसका अंदाजा लगाना भी मुस्किल है,हम इंसानों के पास शिवाय रोने के कुछ नहीं बचेगा इस लिये हमे देर और दुरूस्त बाली नीयतों मे जीना होगा,प्रकृति का कोप न दादागिरी से न कुर्सियों और पैसों से– इसके गुनाह कुबूल कर सार्थक सोच और नतमस्तक होने से बच सकते है,अपने गुनाह कुबूल करने बाला इंसान ,इंसान नहीं रहता है इंसानियत को प्राप्त कर लेता है, तब हमे अपनी घृणित और स्वार्थी नीयतों की आहूतियां देनी ही होगी इस आपदा से बाहर निकलने लिये,हम इंसान है,इंसान बने रहे काफी होगा,एसा धन मत कमाओ कि जल्लाद बन जाएं।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

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