कोरोना: सामाजिक रिश्ते निभायें या मरें

कोरोना: सामाजिक रिश्ते निभायें या मरें

कोरोना नामक ऐसी बीमारी है जो हवा के द्वारा फैल कर अड़ोस- पड़ोस में रहने वालों को संक्रमित कर उन्हें भी मौत के मुंह में धकेल रही है। कोरोना मरीजों के शव को उसके परिजनों तक ने नहीं छुआ, ऐसी भी घटनाएं सुनने को मिली हैं। आदमी किसी कोरोना मरीज की मदद करते हुए स्वयं बीमार हो जाये तो उसे झेल भी सकता है लेकिन कोरोना मरीज की मदद के बाद उस आदमी का पूरा परिवार कोरोना ग्रस्त हो जाता है ऐसी घटनाओं ने पड़ोसियों की मदद करना तो दूर अपनों तक को हाथ लगाने से रोक दिया है। इसी कारण अपने घर-परिवार में हुई मौत के बाद भी लोग उन्हें सांत्वना देने नहीं जा रहे हैं। इस कोरोना नामक बीमारी ने पारिवारिक रिश्तों को भी तोड़ डालने का काम किया है। जिन लोगों ने कोरोना बीमारी से अपनों को खोया है और उनके पास आस-पास के लोग भी अपने परिवार को मौत के साये से बचाने के डर की वजह से मजबूरीवश नहीं आये, वे लोग इस आपदा में अपने ऊपर आई मुसीबत और स्वजन के निधन हो जाने पर भी जो नहीं आये उन्हें कभी भूल नहीं पायेंगे। क्या ऐसे में यह उम्मीद की जा सकती है कि जिन लोगों ने अकेले दुःख झेला है वे उन लोगों के दुःख में शरीक होंगे जो उनके दुःख में मजबूरीवश शरीक नहीं हुए थे। इस प्रकार सामाजिक रिश्तों में इस कोरोना बीमारी ने ऐसा जहर घोल दिया है कि लोग अपने जीवित रहते कभी इस विपत्ति को नहीं भूल पायेंगे और एक-दूसरे की मदद से भी जान-बूझकर हाथ खींचने लगे हैं। हालांकि अभी जो लोग कोरोना पीड़ितों की मदद के लिए नहीं जा सके हैं उनकी यह मजबूरी है कि उनके जीवन के साथ ही पूरे परिवार की जिंदगी का सवाल है। ऐसे में कोरोना से पीड़ित लोगों को अपना दिल बड़ा कर इस सच्चाई को समझना होगा कि पड़ोसियों की बहुत बड़ी मजबूरी के कारण ही उनकी सम्वेदना नहीं मिल सकी है। ईश्वर इस बीमारी से जल्द दुनिया को निजात दिलाये ताकि सामाजिक रिश्तों में और दरारें न बढ़ सकें। यही कामना है।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

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