मां केवल मां ही नहीं होती…..

मां केवल मां ही नहीं होती…..

आज मातृ दिवस है जिसे मदर्स डे के नाम से भी जाना जाता है।इसके लिए समूचे विश्व को अमेरिकी महिला एना जार्विस का कृतज्ञ होना चाहिए जिसने सर्वप्रथम आज के ही दिन 1912 में अपनी मां के निधन के बाद इस दिन को मनाने की शुरूआत की। असलियत तो यह है कि वैसे जीवन में माता-पिता का मूल्यांकन न तो किसी कीमत पर किया जा सकता है और ना ही हो ही सकता है। लेकिन इस कटु सत्य को नकारा नहीं जा सकता कि मां की महत्ता फिर भी सर्वोपरि है।

मां की महानता को न तो एक शब्द में वर्णित किया जा सकता है और ना ही इस विषय में सोचा ही जा सकता है। वह तो एक शब्दकोष है, निबंध भी है और कविता भी। वह सभी रूपों में पूज्यनीय तो है ही, वह प्रेम, त्याग, तपस्या, करुणा, समर्पण, संघर्ष,परोपकार, सेवा, शील, शुचिता और सहिष्णुता की प्रतिमूर्ति भी है। सच तो यह है कि मां के रूपों की जब जब चर्चा की जाती है, की भी जायेगी,वह कभी पूरी नहीं हो सकती। कारण कि उसका रूप इतना विस्तृत है कि उस बारे में किसी भी कीमत पर, किसी भी दशा और कोण से अभिव्यक्ति की ही नहीं जा सकती।

कहा यह ही जाता है कि व्यक्ति के जीवन निर्माण में माता-पिता का योगदान सबसे अधिक होता है। लेकिन यह भी कटु सत्य है कि उसमें मां का योगदान अति महत्वपूर्ण होता है, जिसके बिना वह अपूर्ण ही रहता है। जहां तक मेरा सवाल है, मेरे माता पिता दोनों शिक्षक थे। पिता हाई स्कूल के हैडमास्टर और मां एक इंटर कालेज में भूगोल की प्राध्यापिका। मेरे पिता के इष्ट राम थे और मां के शिव। पिता ने मुझे जहां सत्य के मार्ग पर चलने और ईमानदार बने रहने का पाठ पढा़या, वहीं मां ने समाज हित के लिए संघर्ष करने, एक-दूसरे की हर संभव मदद करने और अपनी बात स्पष्ट कहने का जो पाठ पढा़या, उससे मेरे जीवन में आर्थिक संकटों का तो चोली-दामन का साथ बना ही रहा लेकिन मेरे मित्रों के सहयोग से वह संकट भी समय-समय पर कटते भी रहे। वह बात दीगर है और गौरतलब भी कि उस शिक्षा के अनुकरण के बलबूते ही जीवन में जो इष्ट-मित्रों का प्रेम और स्नेह व सामाजिक मान-सम्मान और प्रतिष्ठा मिली, उसके पीछे मेरी मां की शिक्षा की भूमिका ही अहम रही। यह सही है कि युवावस्था में छात्र संघर्षों, उसके बाद आंदोलनों और राजनीतिक गतिविधियों में संलिप्तता के कारण मेरी शिक्षा अपूर्ण ही रही, मुझे उसका अफसोस भी नहीं लेकिन आज जो कुछ भी हूं, जिस लायक भी हूं, वह उन्हीं की बदौलत हूं। आज वह भले हमारे बीच नहीं हैं लेकिन मुझे सदैव ऐसा एहसास होता है कि वह मेरे साथ ही हैं और उनका आशीर्वाद रूपी हाथ मेरे व मेरे बच्चों के सिर पर बना हुआ है। इसमें दो राय नहीं कि संकट के समय यह अनुभूति और प्रबल होती है।

इस उपकार हेतु मैं आजीवन उनका ऋणी रहूंगा। वैसे तो मां का स्मरण मेरे लिए ही नहीं किसी के लिए भी वरदान से कम नहीं होता लेकिन आज मातृ दिवस है, इस अवसर पर उनकी पुण्य स्मृति और आदर के साथ उनको अपने व परिवार की ओर से श्रृद्धा सुमन अर्पित करता हूं और प्रभु से प्रार्थना करता हूं कि यदि पुनर्जन्म है, तो उसमें भी वह मां रूप में ही मुझे मिलें। इस अवसर पर यही मेरी उन्हें श्रृद्धांजलि होगी।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

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