
क्यों नहीं देती है अब दुलराके,
खताओं की सजा माँ—
अच्छा हुआ कि मेरे पांव तेरे पांव जैसे हैं,
बड़ी ऊबड़ खाबड़,और बेरहम मंजिले है माँ,,
तेरे पहचल की आहट के पीछे-पीछे
जमाने के सयाने पत्थरों पर,अल्हड़ पांव लेकर मंजिलों की तलाश करती रही हूँ माँ,
कोई चित्र देखता था कोई चरित्र देखता था,तेरे नाम का सहारा लेकर तन्हा चली हूँ माँ,
तेरे जाने के बाद बहुत कुछ कमाया है
लेकिन तू बहुत बडी़ सौदागर निकली माँ,
न वह शिक्के कमा सकी जिससे खुशी खरीद लेती न वह मासूम जिंदगी जो बेफिक्र होती है,जिम्मेदारियों ने उम्र और मासूमियत छीन ली,चुभते है ये दौलत के ढेर जिनसे खरीद न सके तेरी (उम्र तेरे आँचल का बाजार माँ)
ऐ मेरी खुदाई तुझे कैसे पाऊं,
तेरे गरीब खाने पर,कुवेरों के सर नतमस्तक रहते थे।
खुदा भी तेरा कायल है,तेरे आँचल के दूधका कर्जदार है माँ।
चुभते हैं ये शिक्के खनकते कानों मे,
तेरे नौ महीने कोख का किराया न चुका सके,
धज्जियां उड़ चुकी हैं गुरूर पत्थर की, सर्म सर्माके समंदर है खुदमे,
कहते थे कि तूने किया क्या है माँ,
तेरे मुस्कराने से महक जाते थे हम,
अब खिलकर भी महकसे दूर है माँ,,
बचपन की खुदाई, जवानी की सहेली,
कहां खो गई है तू,मेरी मासूमियत चुराके माँ,
तेरे जाने के बाद,कोई बात नहीं करता,
मेरी मासूम सरारतों की,
हर भूल की सजा मे गुनहगार बन रही हूँ माँ,
क्यों नहीं देती है अब दुलराके,
खताओं की सजा माँ,,
लेखिका, पत्रकार, दीप्ति चौहान।