डॉक्टर दंपती की तकनीक और रिटायर्ड वैज्ञानिक की मदद से इंदौर के उधोगपति ने आधी कीमत में बना दिया वेंटिलेटर

डॉक्टर दंपती की तकनीक और रिटायर्ड वैज्ञानिक की मदद से इंदौर के उधोगपति ने आधी कीमत में बना दिया वेंटिलेटर

10 महीने की मेहनत से 50 हजार में किया तैयार, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने दी मंजूरी सिलेंडर खत्म होने पर वातावरण से ऑक्सीजन लेकर मरीज को देगा कोरोना के गंभीर मरीजों को आ रही वेंटिलेटर की समस्या को देखते हुए शहर के एक उद्योगपति ने आधी कीमत में देसी वेंटिलेटर बना लिया है विदेश से लौटे डॉक्टर दंपती की तकनीक और कैट के रिटायर्ड सांइटिस्ट की मदद से यह हो सका है उनके वेंटिलेटर को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने मंजूरी दे दी है पोलोग्राउंड में साईं प्रसाद उद्योग के संचालक संजय पटवर्धन ने बताया कि नान इन्वेजिव टाइप का वेंटिलेटर 10 माह में तैयार हुआ है

इसकी कीमत करीब 50 हजार है, जबकि विदेशी वेंटिलेटर एक-डेढ़ से 10 लाख में मिलते हैं यह कम ऑक्सीजन फ्लो में भी सपोर्ट करता है सिलेंडर में ऑक्सीजन खत्म होने पर तीन-चार घंटे वातावरण से ऑक्सीजन लेकर मरीज को दे सकेगा मरीज को कहीं शिफ्ट करना हो या फिर छोटी जगहों पर मरीज गंभीर हो जाए और संक्रमण 50-60 फीसदी हो तो ऐसी स्थिति में यह जिंदगी बचा सकता है इसका वजन दो किलो है, जिससे इसे आसानी से कहीं भी ले जा सकते हैं

यूरोपीय मानकों के अनुसार बना है

पटवर्धन बताते हैं कि डॉ. एसके भंडारी और उनकी पत्नी डॉ. पूर्णिमा के पास इसकी तकनीक थी कैट के रिटायर्ड वैज्ञानिक अनिल थिप्से ने मदद की मेडिकल उपकरण के लिए जरूरी लाइसेंस लेने, यूरोप के मानक के अनुसार बनाने के लिए पार्ट्स अमेरिका, मुंबई आदि जगह से बुलाए टेस्टिंग, रजिस्ट्रेशन आदि में भी काफी समय लगा

वेंटिलेटर की जरूरत इसलिए पड़ती है

वेंटिलेटर तब उपयोग में आता है, जब मरीज खुद सांस नहीं ले पाता वेंटिलेटर दो तरह के होते हैं पहला – इन्वेजिव, जिसमें लंग्स तक पाइपलाइन जाती है। दूसरा- नाॅन इन्वेजिव, जिसमें नाक में पाइपलाइन जाती है मरीज के लंग्स चलते हैं

डॉ. पूर्णिमा भंडारी, डॉ. एसके भंडारी, संजय पटवर्धन, अनिल थिप्से

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

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