सच में होता दम सदा मगर न सुनता कोइ

शब्द मंथन 1

वातायन

सच में होता दम सदा मगर न सुनता कोइ
हाथ साथ का छोड़कर मुक्त न होइ कोइ
जो शंकर सी वीपदा लपटे जटा में होइ
वाको हल का होइगो युक्ति सुझावे कोइ

शब्द अर्थ का खेल है व्याख्या कैसे होइ
जीवन भर सोची नहीं आख्या लेखे कोइ
सवरण को चाहें सभी बंद आंख जो होइ
करनी धरनी भूल के सांच न देखे कोइ

अपनी तो है लिख दई वाकी लिखे न कोइ
वाकी लिखवे की कही यथा न देखे कोइ
सुख दुःख के संसार से मुख मोड़े न कोइ
अंत जानते हैं सभी बुझे गेल न कोइ

मानव बनके राम ने किए बहुत से काम
फिर भी रह गए पूछते सिय से उनका धाम
बिन चाही घटना घटी पृथ्वी जब थी फटी
ऐसी भृकुटि दिखी नहीं जब सिय छोड़ो धाम

कल
: शुभ के साथ लिखना लाभ
राम के साथ पुकारूं सीता
कैसे गाऊं मन का गीत
रघुपति राघव राजा राम ……

: घुमके आता हूँ
लौट के आता हूँ
परिक्रमा पूरी हो
मातपितसे मिल आता हूँ

: न लिखी कोई पहचान
न खींची कोई तश्वीर
नाराज हो रही देवी क्यूं
क्या खिंच गई तश्वीर

आज

: चलो चलने का खन आ गया
बने संभले बुलावा आ गया
राह में यूँ तो बहुत मोड़ थे
पर तुम्हें देख ख्याल आ गया

शब्द नहीं हैं उनके लेकिन जज्वा वही पुराना है
खेल खेलने वालों का आदर्श आज चौहान है
आना जाना पेदल था रस्ता बिहड़ से जाता था
लोटा वाटा खेल खेल में जीत गया चौहान है

पांच दशक पहले की गाथा आज हुई अनजान है
लोह पुरुष बन स्वर्ण पदक ले तेहरान से महान है

शंकर देव तिवारी

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

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