दहेज की आग मे जलते दामपत्य जीवन,
जिंदा इंसानों मे पलता श्यमसान–

#pmCMnyayalay
दहेज की आग मे जलते दामपत्य जीवन,
जिंदा इंसानों मे पलता श्यमसान–
न्याय तो वही है,जो आँखों पर पट्टी बाँधकर किया जाता है,फिर चाहे अपराध महिला ने किया हो या पुरूष ने आज एकतरफा बने केसों ने एकतरफा तबाही मचा रखी है,जी हां हम बात करना चाहते है दहेज केसों की जिसमे भोलेभाले लड़के और उनके परिवार कुँआ और खाई के बीच मे खड़े जिंदगी को जी रहे है और कोर्ट मे एसे केस दसकों तक पीड़ितों से धन उगाही करते है,लड़का,और लड़की की उम्र अदालतों के चक्कर काटते-काटते भविष्य के अंधकार तक पहुंच जाती है,सत्य तो यही है कि आज स्वार्थी सोच ने इंसान का जीना दुस्वार कर रखा है,आज बेटियों की साधारण मौत होना बंद हो गई है,कौन कहता है आजके कलयुग मे माता पिता नहीं बदले है,साहब हकीकत तो यह कि जो दहेज देने की औकात नहीं रखते है वही भोले भाले लड़कों के परिवारों काअदालतों मे सोषण कर रहे है,जिंदा सबूत है मेरे पास आज एसे माता पिता के जो पंद्रह सौ की शादी को लाखों का बताकर बेटियों पर कोर्ट द्वारा बिजनेस करके सभ्य परिवारों की नाकि इज्जत से खेल रहे है,लड़को के जिंदगी और भविष्य पर ग्रहण बने हुये है,एसे केसों मे वकीलों का अच्छा खांसा ब्यापार फलफूल रहा है,तारीख पर तारीख डालकर पैसे ऐंठना केसों को दसको तक अटकाए रखना कोर्ट को ऐसे केसों पर अधिक फोकस रखना चाहिये, यह इंसानों के दामपत्य जीवन और भविष्य दावपर लग जाते है आज हर इंसान मौके को भुनाने मे कमी नहीं छोड़ रहा है,यदाकदा को छोड़कर आज इन एकतरफा केसों की हकीकत नोटों के मोटे पर्तों मे दफन है जब गुनाह नये अवतार मे पैदा हो रहा है तो न्याय क्यों ढांकके तीन पात मे——इसमे संसोधन और पार्दर्शिता की बेहद जरूरत है।
लेखिका, पत्रकार, दीप्ति चौहान।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

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