स्विट्जरलैंड के वेब डिजाइनर बन गए डेन बाबा, पैदल ही जा रहे हैं कुंभ स्नान को

स्विट्जरलैंड के वेब डिजाइनर बन गए डेन बाबा, पैदल ही जा रहे हैं कुंभ स्नान को
~जानें क्या कहते हैं वो~
स्विट्जरलैंड के वेब डिजाइनर बन गए डेन बाबा।
~खुद को जानना है और शरीर को स्वस्थ रखना है तो योग एवं ध्यान से बेहतर कोई माध्यम नहीं। यह कहना है डेन बाबा का।~
~स्वयं को योगसूत्र के रचयिता महर्षि पतंजलि का शिष्य कहने वाले डेन मूलरूप से स्विट्जरलैंड के रहने वाले हैं।~
देहरादून।
‘खुद को जानना है और शरीर को स्वस्थ रखना है तो योग एवं ध्यान से बेहतर कोई माध्यम नहीं।’ यह कहना है डेन बाबा का। स्वयं को योगसूत्र के रचयिता महर्षि पतंजलि का शिष्य कहने वाले डेन मूलरूप से स्विट्जरलैंड के रहने वाले हैं। बीते चार वर्षो से 27-वर्षीय डेन धर्मशाला में रहकर योग-ध्यान सीख रहे हैं। जब उन्हें पता चला कि हरिद्वार में कुंभ हो रहा है तो अपनी एक महिला मित्र ईचेन के साथ पकड़ ली हरिद्वार की राह। वो पैदल ही कुंभ स्नान को जा रहे हैं और विगत दिवस देहरादून पहुंचे हैं।

पेशे से वेब डिजाइनर रहे डेन से मेरी मुलाकात हरिद्वार-देहरादून हाईवे पर मोहकमपुर फ्लाईओवर के पास हुई। वो हाईवे के किनारे फुटपाथ पर ईचेन के साथ ध्यान लगाकर बैठे हुए थे। मेरे करीब जाने पर उनका ध्यान टूटा। अंग्रेजी के साथ ही थोड़ी-थोड़ी हिंदी बोलने वाले डेन ने बताया कि वह चार वर्ष पहले स्विट्जरलैंड से भारत आ गए थे और तब से धर्मशाला में रह रहे हैं। यहां की संस्कृति, परंपराएं और रीति-रिवाज उन्हें इस कदर भाए कि इन्हें जानने के लिए उन्होंने ट्यूशन लेकर हिंदी सीखी। इसमें स्थानीय लोग भी उनकी मदद करते हैं।

डेन बाबा बताते हैं कि वह अपने पास मोबाइल फोन और किसी भी तरह के इलेक्ट्रानिक गैजेट नहीं रखते। इनसे ध्यान-साधना में व्यवधान आता है। वह फुटपाथ पर बिछाए चादर के आसन को ही अपना घर मानते हैं। जहां जरूरत होती है, वहीं सड़क के किनारे फुटपाथ पर अपना बसेरा कर लेते हैं। साथ में चादर के आसन पर बैठी ईचेन के बारे में डेन ने बताया कि वो इस समय ध्यान कर रही हैं। सो, उनसे बातचीत करना उचित नहीं होगा।

डेन ने बताया कि ईचेन
धर्मशाला की रहने वाली हैं। वह दोनों अगले एक माह हरिद्वार में ही रहेंगे और कुंभ स्नान के साथ ही योग-ध्यान का भी अभ्यास करेंगे। इस दौरान उन्हें सनातन संस्कृति और अध्यात्म के दर्शनों का भी अवसर मिलेगा। बकौल डेन, ‘हिमाचल प्रदेश से आते हुए हमें रास्तेभर बहुत अच्छे लोग मिले। यहां के निवासियों का दिल बहुत बड़ा है।’ मैंने जब उनसे स्विट्जरलैंड छोड़ने की वजह पूछी तो बोले, असली खुशी बनावटी जिंदगी जीने में नहीं है। हकीकत को जानना है तो योग और ध्यान की शरण में आना होगा। उन्होंने भी अपना पूरा जीवन योग को समर्पित कर दिया है। अब तो जीवन में आनंद ही आनंद है।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

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