
ध्वस्त हो गया लोकतंत्र देखते ही देखते, क्योंकि भारतीयों ने अपने बच्चों को भारतीय नहीं बनाया, इंसान नहीं बनाया। पैदा होते ही उन्हें हिन्दू, मुसलमान बना दिया। बड़े हुए तो कॉन्ग्रेसी, भाजपाई, संघी, मुसंघी, वामपंथी, दक्षिणपंथी, मोदीवादी, अंबेडकरवादी, गाँधीवादी, गोडसेवादी बना दिया। और चूंकि भारत में भारतीय ही नहीं, तो लोकतंत्र बचेगा कैसे ?
भारतीय होते भारत में, तो यूं तमाशा न देख रहे होते लूटते-पिटते बर्बाद होते देश का।
भारतीय होते भारत में, तो अपने ही देश के स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदानों और स्वप्नों को यूं बर्बाद होते न देख रहे होते।
बहुत से लोग आज भी इस भ्रम में जी रहे हैं कि राजनैतिक पार्टियाँ देशभक्त होती हैं, जनता की हितैषी होती हैं।
वास्तविकता तो यह कि राजनैतिक पार्टियों का देशभक्ति और जनहित से कोई संबंध होता ही नहीं अब। अब तो केवल धंधा करने वालों, हफ़्ता वसूलने वालों, ठगी और लूट खसोट करने वालों का गेंग मात्र होते हैं राजनैतिक पार्टियाँ।
राजनैतिक पार्टियों के नेता और कार्यकर्ता तभी तक जनहितैषी होने का ढोंग करते हैं, जब तक विपक्ष में रहते हैं। लेकिन जैसे ही सत्ता मिली, ये गिरगिट से भी तेजी से रंग बदल लेंगे और डायन महँगाई, एफडीआई को भौजाई बना लेंगे पूरी बेशर्मी से।
कभी सोचा है आपने कि हिन्दू, मुस्लिम, कॉन्ग्रेसी, भाजपाई, संघी, मुसंघी, वामपंथी, दक्षिणपंथी, मोदीवादी, अंबेडकरवादी, गाँधीवादी, गोडसेवादी.. आदि इत्यादि में क्या अंतर है ?
अब तक के मेरे अनुभवों से तो मैं यही कह सकता हूँ कि इनमें कोई भी अंतर नहीं। सभी दड़बे मात्र हैं बत्तखों, मेमनों और गीदड़ों के और इन दड़बों का मालिक या ठेकेदार कोई धूर्त, मक्कार, जुमलेबाज, बिकाऊ नेता होता है। इन दड़बों के सदस्यों का दुर्भाग्य यह कि दड़बा इनकी कोई सहायता नहीं सकता, ठेकेदार कोई सहायता नहीं करता, लेकिन दड़बों के रखरखाव के नाम पर चन्दा हर किसी को देना पड़ता है।
हिन्दू मर रहा हो, पिट रहा हो, लुट रहा हो, बेघर हो रहा हो, बेरोजगार हो रहा हो…हिन्दुत्व के ठेकेदारों के कानों पर जूँ नहीं रेंगती।
मुस्लिम मर रहा हो, पिट रहा हो, लुट रहा हो, बेघर हो रहा हो, बेरोजगार हो रहा हो…इस्लाम के ठेकेदारों के कानों पर जूँ नहीं रेंगती।
कॉन्ग्रेसी मर रहा हो, या भाजपाई मर रहा हो, बेघर हो रहा हो, बेरोजगार हो रहा हो…इन दड़बों के ठेकेदारों के कानों पर जूँ नहीं रेंगती।
देखा होगा आप सभी ने कि अक्सर किसी अस्पताल में लाचार बेबस पड़े मरीज की आर्थिक सहायता या खून की आवश्यकता के लिए सोशल मीडिया पर रिक्वेस्ट आती रहती है। अस्पताल में पड़ा वह मरीज या उसका परिवार क्या किसी दड़बे के अंतर्गत नहीं आता ?
क्या उस मरीज ने किसी भी राजनैतिक दड़बे को वोट नहीं दिया ?
क्या वह मरीज, हिन्दू, मुसलमान, कॉन्ग्रेसी, भाजपाई, संघी, मुसंघी, मोदीवादी, अंबेडकरवादी, माओवादी, आओवादी, जाओवादी…..आदि किसी दड़बा या गेंग का सदस्य नहीं ?
कभी देखा है आपने अस्पताल में पड़े मरीज की सहायता उसके अपने ही दड़बे के लोगों ने की ?
लेकिन मैं चाहता हूँ कि एक ऐसा दड़बा अवश्य बने, ऐसी राजनैतिक पार्टी अवश्य बने भविष्य में कभी, जिसके सदस्य लाचार, बेबस न हो पायें कभी। जिसका एक भी सदस्य कभी किसी भी संकट में हो, तो तुरंत उसकी सहायता के लिए दूसरे सदस्य पहुँच जायें। एक ऐसा दड़बा अवश्य बने भारत में, जिसमें भारतीय हों, जिसमें मानव हों, और मानवता से भरा हो हर सदस्य, हर नेता उस दड़बे का।
ऐसी राजनैतिक पार्टी बननी चाहिए, जिसके लिए महँगाई और एफडीआई यदि विपक्ष में रहते समय डायन हो, तो सत्ता में आने के बाद भी डायन ही हो, भौजाई न बन जाए।
ऐसी राजनैतिक पार्टी बननी चाहिए, जो बिकाऊ न हो, जिसका ईमान, जमीर नीलामी का सामान न हो।
सपना देखा है मैंने, कभी न कभी तो यह सपना साकार होगा ही, ऐसा विश्वास है मेरा।