उड़ान नए पंख की – लघुकथा

(मातृ दिवस पर )
उड़ान नए पंख की – लघुकथा

तुम मुझसे दूर ही कब थीं मां !! हर पल तुम्हारे शब्द मेरे साथ होते । सोती तो तुम्हारे ही शब्दों का तकिया बना कर ।
मां तुम्ही ने तो कहा था -” मेरे आंगन की नन्ही चिरैया !! , सपनों को मरने न देना , क्योंकि अगर सपने मर गए तो जिंदगी टूटे पंख की चिड़िया जैसी हो जायेगी -जो उड़ नहीं पाती । मैं चाहती हूँ तुम एक नई उडान भरो -धरती से उन्मुक्त आकाश तक । ‘
कितनी अकेली हो गई थी तब मैं , जब अपने ही बलात्कारियों के खिलाफ दर्ज मुकदमे की तारीख पर कचहरी जाते समय रास्ते में एक ट्रक हमारी ओर तीव्र गति से आया और जब तक मैं समझ पाती मां ने मुझे परे धकेल दिया । मुड़ कर मैंने देखा – उसके जिस्म के चीथड़े सड़क पर पड़े थे । मारना तो शायद मुझे ही चाहते थे लेकिन हमेशा की तरह मां ही ढाल बन कर खड़ी हो गई थी। उस दिन हिम्मत टूट गई थी मेरी । अवसाद से घिरी आंसू ही बहाती रहती ।उस दिन समझ मे आया कि साधारण परिवार की लड़की को कितने मोर्चों पर लड़ना होता है । अपनी अस्मिता के लिए , अपने ही पक्ष में खड़े होने के लिए ,अपने अस्तित्व और व्यक्तित्व के लिए । लेकिन मां ने उसे कभी टूटने नहीं दिया । बादल के टुकड़ों में , कौंधती आकाशीय बिजली में मुझे मां ही दिखाई देती । हिम्मत देती हुई। ध्रुव तारे का डिठौना लगाती हुई ।
आकाश से उसकी आँखे मुझे निहारतीं थीं -एकटक …! आशीष बरसाती रही मुझ पर ….तुम्हे उड़ना होगा मेरी बिटिया , कटीली फुनगियों पर चढ़ कर , आवाज देना होगा क्षितिज को , विषमताओं की हवा में , सुनहरे पंख फैला कर पर्वत की शिखा को छूना होगा ….। मां के अनकहे शब्द , उसके छू लेने के अहसास मात्र से मुझमें नई ऊर्जा भर देती थी । तभी तो धीरे धीरे अपने नए पंखों के साथ उड़ान भरने को मैं तैयार हो गई ।
आज मां की तस्वीर के समक्ष मैं अपनी वर्दी के साथ खड़ी थी । उन्हें सैल्यूट किया —
” तेरे आंगन की चिरैया ने हौसले की उड़ान भरना सीख लिया है –पुलिस कप्तान का सैल्यूट स्वीकार कर मां !!!!

-डॉ निरूपमा वर्मा –
एटा -उत्तर प्रदेश

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